झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ लक्ष्मीबाई
बख्शिशअली ने उस आज्ञा का यह अर्थ समझा कि कैदी के साथ
पूरी रियायत की जावे ।
'स्कीन और गार्डन उधर गये और इधर बख्शिशअली ने कुँवर
सागरसिंह की हथकडी-बेडी खोल दी । केवल साधारण पहरा रहने दिया ।
सागरसिंह ने कहा, 'दरोगा साहब, बहुत भूख लगी है । किसी
ब्राह्मण के हाथ अच्छा खाना पकवा दीजिये ।'
बख्शिशअली बोला, 'कुँवर साहब, मै तो पूडी-मिठाई से आपका
थाल भर देता, परन्तु इन अफसरों के मारे मजबूर हूँ। अब लीजिये,
कोई दिक्कत नही रही, हुकुम हो गया है ।'
अच्छा खाना बनवाया गया । आदर के साथ परोसा गया ।
पहरेदारो के मन पर भी कुँवर साहब का आतंक छा गया ।
शाम हुई । रात हुई । पहरे वाले जागते जागते, सो गये ।
बख्शिशअली को दिन भर के परिश्रम के मारे थकावट आई । वह भी
चैन में सो गया ।
कुँवर सागरसिंह को सुअवसर प्राप्त हुआ । चन्दवरदाई का दोहार्द्ध
याद आया—'फेर न जननी जन्म है, फेर न खेचे कमान' और चुपचाप
दीवार लांघकर नौ-दो-ग्यारह हुआ और सवेरा होते होते ऐसे जङ्गल मे
पहुच गया, जहा उसके विश्वास के अनुसार, स्कीन और गार्डन के फरिश्ते
भी नही पहुँच सकते थे ।
प्रात.काल जेल भर मे गडबडी फैल गई । बख्शिशअली का होश
कपूर हो गया । कभी जेल में हडबडाकर पहुँचता और कभी घर में बीबी-
बच्चो के पास आकर सिर पीटता ।
स्कीन और गार्डन के पास भी खबर पहुंची । वे दोनो तुरन्त आये ।
क्रोध में डूबते-उतराते ।
बख्शिशअली ने अत्यन्त विनम्र प्रणाम किया । और अत्यन्त कातर
स्वर मे कहा, 'हुजूर हुकुम दे गये थे कि हथकडी-बेडी खोल दो और