झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ झाँसी की रानी
गार्डन के चेहरे पर सन्तोष की मुस्कराहट आगई । बोला, 'अब ठीक
है । जाओ ।'
उसी समय झाँसी से एक हरकारा कमिश्नर स्क्रीन की चिट्ठी लेकर
आया । स्क्रीन ने उसको समाचार दिया था कि सागरसिंह नामक डाकू
पकड़ा गया है, जेल में बन्द है । जेल का निरीक्षण करना चाहता हूँ ।
एक दिन के लिये जल्दी आजाओ ।
गार्डन ने घोड़ा गाड़ी से झांसी की ओर कूच कर दिया । मार्ग में
घोड़े बदलता हुआ दूसरे दिन झाँसी पहुँच गया ।
उसके दूसरे दिन जेल का मुआइना हुआ । स्कीन और गार्डन साथ
थे । बख्शिशअली जेल का दरोगा था बड़े विनम्र भाव से सलामें झुकाता
हुआ, उन दोनों के सामने आया । दोनों प्रसन्न हुये । उनको इस प्रकार
का शाही अदब कायदा पसन्द था ।
जेल के भीतर जाकर सागरसिंह को देखा । तगड़ा फुर्तीला आदमी
था । आंख तीक्ष्ण और चमकदार, दाढी कानो पर चढी हुई; हथकडी
बेडी से जकडा हुआ ।
स्क्रीन ने पूछा, 'क्या नाम है ?'
'क्या आपको मालूम नहीं ?'
'तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ ।'
'कुँवर सागरसिंह ।'
'कहाँ के रहने वाले हो ?'
'रावली के-बरुआसागर से कुछ दूर ।'
'तुमने यह पेशा क्यों अपनाया ?'
'क्योंकि इससे बढ़िया कुछ और मिला नहीं ।'
'हमारी फौज में नौकरी क्यों नहीं की ? अच्छा वेतन मिलता ।'
'हमारे घराने में अफसरी होती आई है । हम कोरी सिपाहीगीरी
कैसे करते ?'
'तुम धीरे धीरे नायक, हवलदार और फिर सूबेदार तक हो
सकते थे ।'