झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंहवेली बडी थी । उसमे कई कक्ष थे । परन्तु उजाला केवल दो कक्षो
में था । बाकी सूनी और अँधेरी थी । बाहर पहरेदार थे ।
उजाला दीपको का था । शमादानो में जल रहे थे । दो कमरो मे
अलग अलग् । दोनो कमरे एक दूसरे से काफी दूर ।
जिस पहले कमरे में नवाब अलीबहादुर गये उसमें सिवाय खुदाबख्श
के और कोई न था । अभिवादन के बाद उनमें बातचीत होने लगी ।
खुदाबख्श ने आशामयी आँखो से कहा, 'हुजूर ने मेरी विनती तो
पेश की ही होगी ?'
अलीबहादुर ने उत्तर दिया, 'नही भाई मौका नही आया । जानते
हो महाराज अब्बल दर्जे के जिद्दी हैं । एकाध दिन मौका हाथ आने दो,
तब कहूँगा ।'
खुदाबख्श—'उस कमरे में बिचारी मोतीबाई उम्मेदे बाधे बैठी है ।
उसका तो कोई कसूर ही नही है । उसके लिये आप कुछ कह सके ?'
अलीबहादुर—'क्या कहता ? वहा तो बनियो और छोटे-छोटे लोगो
की बन पडी । मेरे लिये ही कुछ नही हुआ ।'
खुदाबख्श—'ऐ !'
अलीबहादुर—'जी हा । जागीर चूल्हे में गई—पैन्शन बढाने के लिये
अर्ज की तो कह दिया कि बडे साहब से सलाह करेगे । मै सोचता हूँ कि
हमी लोग बडे साहब से क्यो न मिले ? आपके साथ काफी जुल्म हुआ
है । आप मुद्दत से छिपे-छिपे फिर रहे है । जिस मीतीबाई के लिये राजा
पलक-पाँवडे बिछाते थे, वह बिचारी दर-दर फिर रही है । एक दिन
मुझको यह और राजा के अनेक अत्याचार बडे साहब के सामने साफ
बयान करने हैं । आप भी चलना ।'
खुदाबख्श—'मैं तो आज तक किसी गोरे से नही मिला । आपकी
उनसे दोस्ती है । आप जैसा ठीक समझे करे ।'
अलीबहादुर—'मोतीबाई से अर्जी न दिलाई जावे ? आपसे कुछ
बातचीत हुई ?'