झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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जिस दिन गङ्गाधरराव के पुत्र हुआ उस दिन सम्वत् १९०८
( सन् १८५१ ) की अगहन सुदी एकादशी थी । यो ही एकादशी के
रोज मन्दिरो में काफी चहल पहल रहती थी, उस एकादशी को तो
आमोद प्रमोद ने उन्माद का रूप धारण कर लिया । अपनी प्यारी रानी
के गर्भ से पुत्र की उत्पत्ति का समाचार सुनकर झासी थोडे समय के लिये
इन्द्रपुरी बन गई ।
राजा ने बहुत खर्च किया, इतना-कि खजाना करीब करीब खाली
कर दिया । दरिद्रो को जितना सम्मान उस अवसर पर झासी मे मिला,
उतना शायद ही कभी मिला हो ।
दरबार हुआ । गवैये आये । मुगलखाँ का ध्रुपद सिरे का रहा ।
उसको हाथी बख्शा गया । नर्तकियो में दुर्गाबाई खूब पुरस्कृत हुई ।
नाटक हुआ । परन्तु उसमे मोतीबाई न थी । राजा के मन मे आया कि
उसको फिर से रगशाला में बुलवा लिया जावे, परन्तु न किसी ने
सिफारिश की और न राजा अपने हठ को छोडकर स्वय प्रवृत्त हुये ।
दरबार मे सभी जागीरदारो को कुछ न कुछ मिला ।
उस दरबार में केवल एक व्यक्ति अपनी इच्छा की पूर्ति न करा सका ।
वे थे नवाब अलीबहादुर-राजा रघुनाथराव के पुत्र । जब अङ्गरेजो ने
रघुनाथराव के कुशासन काल मे झासी का प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया
था, तभी उनकी जागीर जब्त कर ली गई थी । और उनको पाच सौ
रुपया मासिक पेंशन दी जाने लगी थी । जब गङ्गाधरराव को
राज्याधिकार मिला तब उन्होने यह पैन्शन जारी रक्खी । अलीबहादुर
चाहते थे कि यथा संभव उनको वही जागीर फिर मिल जावे । जागीर न
मिल सके तो पेंशन में काफी वृद्धि कर दी जावे । जागीर मिलती न
देखकर अलीबहादुर ने पेंशन बढाने के लिये विनय की । राजा ने
पोलिटिकल एजेण्ट से सलाह करने की बात कहकर नवाब को उस समय
टाला । नवाब का मन मसोस खा गया । परन्तु उन्होने आशा नही