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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 850, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 850

रहने से काम चल जाय तो मौन रहना ठीक है। यदि मौन से साधु पुरुषों की रक्षा नहीं होती हो, न बोलने से शङ्का
होती हो और अवश्य बोलना पड़े तो झूठ बोलकर भी सत्पुरुषों का बचाव करना चाहिये ।
“यः पापैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथादपि ।
न तेभ्योऽपि धनं देयं शक्ये सति कथञ्चन ॥
पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् ।” (म० भा० शान्ति प० १०९।१६,१७)
झूठी शपथ द्वारा भी दुष्टों से छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिये । यहाँ सत्य की अपेक्षा झूठ ही श्रेष्ठ
है, क्योंकि दुष्टों को दिया हुआ धन दाता को भी पीड़ा ही पहुँचाता है।
“मा हिंस्यात्” इस वेदवचन से निषिद्ध होने के कारण यद्यपि हिंसा अधर्म है तथापि “अग्नीषोमीयं
पशुमालभेत” के अनुसार क्रतु के उपकार के लिए की गयी हिंसा धर्म ही है। यह सब “अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्”
( ब्र० सू० ३।१।२५ ) में स्पष्ट है। कहीं सत्य कहीं अनृत ही बोलना चाहिये। जहाँ अहिंसा के कारण अनृत सत्य
हो जाता हो और हिंसा के कारण सत्य अनृत हो जाता हो, जहाँ सत्य अहिंसा, उपकार आदि में पर्यवसित न होता
हो उस स्थल में मूढ़ सत्यवादी भी बाधित होता है। सत्य और अनृत का यथावत् जाननेवाला धर्मतत्त्वज्ञ होता है।
इसी आधार पर अकृतप्रज्ञ अतिदारुण अनार्य भी उसी तरह महान् पुण्य का भागी होता है जैसे वलाक सब प्राणियों
के वधार्थ उद्यत अन्ध घ्राणचक्षु के वध से पुण्य का भागी हुआ था। इसमें आश्चर्य क्या है ? धर्म की कामनावाला
भी सत्यवादी अधर्म निश्चय के कारण डाकुओं एवं गोघातकों को साधुओं एवं गायों का पता बताकर पाप का भागी
हुआ था। तत्त्वज्ञ उसी प्रकार पुण्य का भागी होता है, जैसे गङ्गातीर में सर्पिणी के अण्डों को नष्ट करके उलूक पुण्य
का भागी हुआ था—
“भवेत् सत्यं न वक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् ।
यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् ॥
तादृशो बध्यते बालो यत्र सत्यमनिश्चितम् ।
सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ।।
अप्यनार्योऽकृतप्रज्ञः पुरुषोऽप्यतिदारुणः ।
सुमहत् प्राप्नुयात्पुण्यं वलाकोऽन्धवधादिव ।।
किमाश्चर्यञ्च यन्मूढो धर्मकामोऽप्यधर्मवित् ।
सुमहत्प्राप्नुयात्पुण्यं गङ्गायामिव कौशिकः ।।”(म०भा० राजधर्मानुशासनपर्व १०९।५-८)
वस्तुतः प्राणियों में प्रभव के लिए अर्थात् अभ्युदय, अहिंसा, अपीडन और धारण के लिए ही धर्म का
प्रवचन किया गया है। अतः व्यापक रूप से प्राणियों का अभ्युदय, अपीडन और संरक्षण जिससे होता है, वह
चाहे सत्य हो चाहे असत्य, किन्तु वही धर्म है। यद्यपि अहिंसा और सत्य दोनों ही शास्त्रविहित हैं तथापि
अहिंसाविरोधी सत्य अग्राह्य है। इसी लिए गीता ने हित, मित, प्रिय और सत्य भाषण को ही सत्य कहा है, केवल
सत्य को नहीं—
“प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ।
यः स्यात्प्रभवसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।।
धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मेण विधृताः प्रजाः ।
यः स्याद्धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।।
अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ।
यः स्यादहिंसासंपृक्तः स धर्मं इति निश्चयः ।।"