रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवस्तुपरिच्छेद से रहित वृहत् ब्रह्म वस्तु ही बोधित होती है और वे निरतिशयानन्दस्वरूप हैं। फिर प्राकृत या अप्राकृत
कोई भी गुण महत्त्वातिशयाधान द्वारा या अनर्थनिवर्हण द्वारा भगवान् में कैसे सार्थक हो सकते हैं। तो भी गुण जन्म-
जन्मान्तरों की तपस्याओं एवं उपासनाओं द्वारा प्रभु से सम्बन्धित होते ही हैं।
तुलसी के मानस में भी काव्यगुणों की कमी नहीं है। एतावता भी उसकी उद्देश्यपूर्ति में बाधा नहीं पड़ी।
फिर वसिष्ठ, वाल्मीकि, व्यास आदि के काव्यगुणों से भगवान् के स्वरूप का आवरण कैसे होता है ? अतः व्यर्थ ही
यहाँ वाल्मीकि, व्यास, भवभूति और कालिदास के काव्यों एवं तुलसी के-“गिराग्राम्य सियराम जस” के तारतम्य
वर्णन का प्रयास किया गया है। तुलसी स्वयं जिन्हें पूज्य और वन्दनीय मानते हैं, उनके विरुद्ध तुलसी की पंक्तियों
को जोड़ना धृष्टता ही नहीं, अक्षम्य अपराध भी है।
यह कथन नितरां असङ्गत है कि “भूतभावन शिव और तुलसीदास दोनों की दृढ़ मान्यता है कि श्रीराम
एक व्यक्ति न होकर साक्षात् ईश्वर हैं। इसी लिए व्यक्ति के इतिहास की भाँति श्रीराम का चरित्र प्रस्तुत नहीं किया
जा सकता।” क्योंकि यह बात शिवजी एवं तुलसी की ही क्यों वसिष्ठ, वाल्मीकि और व्यास को भी यही सम्मत
था। लेखक तो केवल तुलसी के मानस के अनुसार तुलसी और शिव के सम्बन्ध में राय प्रकट कर सकता है। अलग
से तो शिवजी की मान्यता के सम्बन्ध में उसके पास कोई प्रमाण ही नहीं है।
यदि इतिहास और पुराणों के आधार पर कुछ कहेगा तो वह इतिहास-पुराणों का ही मत समझा जायगा।
वस्तुतः यदि तुलसी के ही कथनानुसार तुलसी की बात मान्य है तब उसी तरह कबीर, सूर, नानक आदि की
मान्यताएँ ठहरेंगी। उस स्थिति में मानस की कोई विशेषता नहीं सिद्ध होगी। वस्तुतः बेसिरपैर की निराधार '
कल्पनाओं की अपेक्षा तुलसी के अनुसार उनके मानस का आधार नानापुराणनिगमागम ही है। तुलसी की परम्परा
और उनके मूल शिव का भी आधार नानापुराणनिगमागम ही है।
प्रत्यक्ष में भी सहस्रों चौपाइयों का आधार अध्यात्मरामायण एवं श्रीभागवत में ज्यों का त्यों मिलता है।
वाल्मीकिरामायण को वे स्वयं महान् सेतु मानकर उसी के आधार पर चलनेवाली पिपीलिका के समान अपने आपको
मानते हैं।
वेद, वाल्मीकिरामायण और व्यास के पुराण डङ्के की चोट पर इतिहास की भाँति श्रीराम का चरित्र
प्रस्तुत करते हैं। “एक व्यक्ति जन्म लेकर कुछ वर्षों के पश्चात् मृत्यु का ग्रास बन जाता है। उसके जीवन में जो
घटनाएँ घटती हैं, उन्हीं को इतिहास में रखा जाता है। व्यक्ति पुनः उसी रूप में लौट कर पृथिवी पर नहीं आ
सकता।”
यह कोई वेदाज्ञा या राजाज्ञा नहीं। ‘इति ह आस ऐतिह्य’ यही इतिहास है। वेद में भी इतिहास है।
‘इतिहासः पुराणम्’ बृहदारण्यकोपनिषद्, उर्वशी-पुरूरवा-संवाद, यम-यमीसंवाद, याज्ञवल्क्य-मैत्रेयीसंवाद,
याज्ञवल्क्यगार्गीसंवाद इतिहास है। परन्तु वेद अनादि हैं—‘अनादिनिधना नित्या’ (म० भा० शा० २३३।२४),
‘वाचा विरूपनित्यया’, ‘अतएव च नित्यत्वम्’ (ब्र० सू० १।३।२९) इत्यादि वैदिक प्रमाण स्पष्ट हैं। यहाँ
घटना के अनन्तर इस इतिहास का उल्लेख नहीं हुआ।
वेद और मनु के अनुसार वेदशब्दों के अनुसार सृष्टि होती है। यही बात “शब्द इति चेन्नातः
प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्” (ब्र० सू० १।३।२८) से कही गयी है। ऐसे इतिहास नित्य इतिहास कहे जाते हैं।
जैसे सामान्य नियम है कि कोई देहधारी नित्य नहीं होता। किन्तु राम, कृष्ण आदि के शरीरों के सम्बन्ध
में यह अपवाद है। उनके शरीर नित्य हो सकते हैं। उसी तरह सामान्य ऐतिहासिक व्यक्ति उत्पन्न और नष्ट होने-