रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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“मातृवत् स्वसृवच्चैव तथा दुहितृवच्च ये ।
परदारेषु वर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥”
रावण के मारे जाने पर अग्निश्रेष्ठ भानुमद्भिर् द्युभिर्हरिः सीतया रामदारा सीता के साथ राम के संमुख अपने
श्वेतवर्ण तेज के साथ आये।
'इदं विष्णुर्विचक्रमे' ( ऋ० सं० १।२२।१७ ) में सायण का कहना है कि “विष्णोस्त्रिविक्रमावतारे
पादत्रयक्रमणस्य प्रसिद्धत्वात्” विष्णु के त्रिविक्रमावतार में पादत्रयक्रमण प्रसिद्ध है ।
‘ब्राह्मणो जज्ञे दशशीर्षो दशास्यः’ (अथर्वसं० ४।६।१) दससिरवाला ब्राह्मण ही -रामायण तथा पुराणों में
रावणरूप से प्रसिद्ध है ।
• अवतारवाद एवं सीता-राम का महत्त्व
“मनवे ह वै प्रातः । ....तस्यावनेनिजानस्य मत्स्यः पाणी आपेदे ।” (श० ब्रा० १।८।१।१)
अवनेजन करते हुए मनु के हाथों में मत्स्य आ गया । इससे मत्स्यावतार सिद्ध होता है ।
“स यत् कूर्मो नाम ।” (श० ब्रा० ७।५।१।५)
यह कूर्मावतार का मूल है ।
वाराहावतार—
“आपो वा इदमग्रे वाराहो भूत्वाहरत् ।” (तै० सं० ७।१।५।१)
इसमें वाराहावतार का सङ्केत है ।
“वराहेण पृथिवी संविदाना सूकराय जिहीते मृगाय ।” (अथर्वसं० १२।१।४६)
“उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना ।”
“भूमिर्धेनुर्धरणी लोकाधारिणी ।” (तै० आ० १०।१)
नृसिंहावतार—
“प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः ।” (ऋ० १।१५४।२)
“वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि तन्नो नरसिंहः प्रचोदयात् ।” (तै० आ० १० परिशिष्ट)
इदं विष्णुर्विचक्रमे”—यह वामनावतार का सङ्केत है ।
त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः ॥” (ऋ० १।२२।१८)
“यो रजांसि विममे पार्थिवानि त्रिश्चिद्विष्णुः ।” (ऋ० सं० ६।४९।१३)
“वामनो विष्णुरास ।” (श० ब्रा० १।२।५।५)
“क्रोधाद्विष्णुरुुरुगायो विचक्रमे ।” (तै० ब्रा० ३।१।२)
परशुराम ( ऋ० सं० १०।११०।१ ) मन्त्र के ऋषि हैं ।
“कालियो नाम सर्पो नवनागसहस्रबलः ।
यमुनाह्रदे स जातो यो नारायणवाहनः ॥” (ऋ० सं० ७।५५।४ खिल)