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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 727

विंश अध्याय
रामचरितसिंहावलोकन
वेदों तथा पुराणों में अवतारवाद प्रसिद्ध है । विभिन्न शिव, विष्णु आदि देवताओं के भी अवतार होते हैं ।
विशेषतः विष्णु के तो असंख्य अवतार होते हैं । श्रीराम तो साक्षात् अवतारी विष्णु ही थे—
“भवान्नारायणो देवः ।” “आदिकर्ता स्वयंप्रभुः ॥ ( वा० रा० ७।११९।१३,१८ )
विष्णुपरक वेदमन्त्रों की व्याख्या
जो पृथिवी निमित्त पृथिवी में उपार्जित कर्मफल भोग के लिए भूरादि तीन लोकों का निर्माण करते हैं
तथा उत्कृष्टतर उपासकों के सहस्थान सत्यलोक को ध्रुवरूप से स्थापित करते हैं, जो स्वरचित लोकों का त्रेधा क्रमण
करते हुए अतिप्रभूत गीयमान होते हैं उनके वीर्य का मैं वर्णन करता हूँ ।
“विष्णुर्गोपा अदाभ्यः अतो धर्माणि धारयन् ।” ( ऋ० सं० १।२२।१८ )
पृथिवी के पालक विष्णु अहिंसनीय, अप्रधृष्य हैं । वे ही विविध धर्मों को धारण करते हैं । अन्तर्यामी
रूप से सभी धर्मों तथा प्रपञ्चकार्यों के धारक हैं ।
“इन्द्रस्य युज्यः सखा ।” ( ऋ० सं० १।२२।१९ )
विष्णु इन्द्र के उपेन्द्ररूप से सदा अभिन्नहृदय सखा हैं ।
“सदा पश्यन्ति सूरयः ।” ( ऋ० सं० १।२२।२० )
विद्वान् सदा ही उनका ब्रह्मरूप से दर्शन करते हैं ।
“तद् विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते ।
विष्णोर्यत् परमं पदम् ॥” ( ऋ० सं० १।२२।२१ )
व्यवहारातीत निवृत्तिनिष्ठ जागरूक विद्वान् विष्णु के स्वरूपभूत परम पद ( प्राप्य ) तत्त्व को जानते हैं ।
“दिवो वा विष्ण उत महो वा उरोन्तरिक्षम् ।
उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वाप्रयच्छ दक्षिणा दोतसव्यात् ॥” (यजुः सं० ५।१९)
मेधातिथि कहते हैं हे विष्णो ! पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश से विविध मणि, मुक्तादि धन-सम्पत्ति अपने
दोनों हस्तों को भरकर मुझे प्रदान करो ।
“यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कम्भायदुत्तरं सधस्थम् ॥” (ऋ० सं० १।१५४।१)
“य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा ।” ( ऋ० सं० १।१५४।४ )
जिस विष्णु ने पृथ्वीसम्बन्धी रञ्नात्मक क्षित्यादि लोकत्रयसम्बन्धी अग्नि, वायु और आदित्य रूपों का
विशेषरूप से निर्माण किया था ।
“योस्यां पृथिव्यां द्वितीयस्यां तृतीयस्यां पृथिव्याम् ।” ( तै० सं० १।२।१२।१ ) के अनुसार अन्तरिक्ष
आदि भी पृथिवी के ही भाग कहे गये हैं । अतः भूः, भुवः और स्वः तीनों लोक पृथिवीशब्दवाच्य हैं । जिस विष्णु