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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 717

( ७।१५०।१५ ), वृषसेन के ध्वज पर मयूर ( ७।८०।१६ ), जयद्रथ के झण्डे पर वराह ( ७।१२१।११ ) एवं
अश्वत्थामा के झण्डे पर सिंह ( ६।१७।२१ ) । इसी तरह अर्जुन को लाङ्गूलकेतन ( ६।१७।२१ ), कृष्ण को गरुड़-
ध्वज ( ७।५७।२ ) तथा प्रद्युम्न को मकरध्वज ( ७।९६।२५) कहा गया है । डब्लू हॉप्किन्स के अनुसार इन चित्रों
का प्रयोजन पूजा न होकर प्रोत्साहन तथा अलङ्करणमात्र ही था । महाभारत के प्रामाणिक संस्करणों से विदित होता
है कि अर्जुन के ध्वज में अन्य पशु भी अङ्कित थे, परन्तु कपि ही उनमें प्रमुख था ( २।२२।२३ ) । अर्जुन को कपि-
राजकेतन कहा गया है ( ६।५६।२६ ) । इसी प्रकार वानरध्वज ( ६।११२।१४), वानरप्रवरध्वज ( ७।१७।२१ )
तथा कपिप्रवरकेतन ( ७।१६।१५ ) भी कहा गया है ।" वस्तुतः यह भी गलत है, क्योंकि सामान्य ध्वजों में चित्रों का
प्रोत्साहनमात्र प्रयोजन हो सकता था, किन्तु महाभारत के प्रमाणानुसार अर्जुन का जैसा विशिष्ट रथ था, वैसा ही
उसका ध्वज भी विशिष्ट ही था । उसमें केवल हनुमान् का चित्र ही नहीं था, किन्तु स्वयं हनुमान् उसपर विराजते थे
और प्रत्यक्ष गर्जन करके शत्रुओं को भयभीत भी करते थे; जैसा कि द्रोणपर्व ( अध्याय ६४ ) के अनुसार विदित होता
है। जब अर्जुन ने रणभूमि में शङ्ख बजाया तब अर्जुन की ध्वजा पर विराजमान भूतगणों के साथ हनुमान् ने मुंह
बाकर शत्रुओं को भयभीत करते हुए बड़े जोर से गर्जन किया—
“ततः कपिर्महानादं सह भूतैर्ध्वजालयैः ।
अकरोद् व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ॥” ( म० भा० ६।६४।२५ )
उद्योगपर्व (अध्याय ५५) में भी कहा गया है कि विश्वकर्मा, ब्रह्मा और इन्द्र ने मिलकर उसमें छोटी बड़ी
अनेक प्रकार की बहुमूल्य दिव्य मूर्तियों का निर्माण कर रखा था—
“ध्वजे हि तस्मिन् रूपाणि चक्रुस्ते देवमायया ।
महाधनानि चित्राणि महान्ति च लघूनि च ॥” ( म० भा० ५।५५।८ )
इतना ही नहीं, महाभारत में यह भी उल्लेख है कि अर्जुन का रथ कहीं प्रतिहत नहीं होता था । वृक्षों
तथा पर्वतों में भी कहीं टकराता नहीं था । अतः कहना होगा कि विशिष्ट रथों पर ध्वजों में विशेषता होती थी, केवल
चित्रमात्र नहीं । आज भी ध्वजाओं का विशिष्ट सम्मान होता है । उसके सम्मान या अपमान में सारे राष्ट्र का सम्मान
या अपमान माना जाता है । विशिष्ट सम्बन्धों एवं विशिष्ट कारणों से हनुमान्जी अर्जुन के रथ पर कभी अंशतः कभी
युद्धादि के समय प्रत्यक्ष ही पूर्ण शक्ति के साथ विराजमान रहते थे । केवल हनुमान् की कीर्ति एवं लोकप्रियता के
कारण अर्जुन की ध्वजा के साथ उनका सम्बन्ध जोड़ा नहीं गया । हनुमान् और भीम के संवाद से ही नहीं किन्तु
उपर्युक्त—
“अकरोद् व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ।”
श्लोकानुसार भी हनुमान् का अर्जुन के रथ से विशिष्ट सम्बन्ध विदित होता ही है । भीम और अर्जुन पर अनुग्रह कर
हनुमान् ने वर प्रदान किया था ।
सीता-त्याग
उत्तरकाण्ड के सीतात्याग का अपलाप करते हुए बुल्के कहते हैं कि “आदिरामायण में रामकथा राम के
अभिषेक तथा राम के सुखद राज्य के संक्षिप्त वर्णन पर समाप्त होती है और उसमें सीता-त्याग का निर्देश नहीं है ।
महाभारत के रामोपाख्यान में भी कहीं सीता-त्याग का उल्लेख नहीं है । प्राचीन पुराणों, जैसे हरिवंश, वायुपुराण,
विष्णुपुराण तथा नृसिंहपुराण में सीतात्याग का संकेतमात्र भी नहीं मिलता है ।” परन्तु उनका यह कहना निरर्थक है,
क्योंकि आदिरामायण नाम का ग्रन्थ कोई है ही नहीं । वर्तमान रामायण में सीता-त्याग है ही । उसको प्रक्षिप्त कहना