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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 705

६२८ रामायणमीमांसा एकोनविंश
१४८ ) तथा चार वर्णों ( अध्याय १४९ ) के धर्मों का उपदेश करते हैं । किन्तु बुल्के अन्यत्र महाभारत में न होने
के कारण वाल्मीकिरामायण में विद्यमान अंशों को क्षेपक कहते हैं परन्तु महाभारत के आरण्यक पर्व में हनुमान् के
लिए शास्त्रज्ञ होने का उल्लेख होते देखकर कहते हैं कि यह उल्लेख उत्तरकाण्ड के प्रभाव से हुआ है । उत्तरकाण्ड
को तो वे प्रक्षेप मानते ही हैं । वस्तुतः उनके ही पूर्वोक्त तर्कों के अनुसार महाभारत आरण्यक पर्व से समर्थित होने के
कारण उत्तरकाण्ड को प्रामाणिक काण्ड मानने के लिए उन्हें बाध्य होना चाहिये । साथ ही उन्हें इस बात का भी
ध्यान नहीं है कि वे महाभारत के स्वयं रामोपाख्यान की छाप वाल्मीकिरामायण पर मान चुके हैं । फिर उन्हें महा-
भारत पर उत्तरकाण्ड का प्रभाव मानने का क्या अधिकार है । यों उनकी अधिकांश बाते उन्हीं के विरुद्ध हैं ।
सिद्धान्ततः दाक्षिणात्य पाठ भी प्रामाणिक ही है । उसमें स्पष्ट कहा है कि हनुमान् तीनों वेदों एवं व्याकरण
के महान् विद्वान् थे—
“नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः ।
नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम् ॥
नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् ।
बहु व्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम् ॥” ( वा० रा० ४।३।२८,२९ )
राम कहते हैं जिसे ऋग्वेद में शिक्षा नहीं प्राप्त है, जो यजुर्वेद नहीं जानता तथा जो सामवेद का विद्वान्
नहीं है वह ऐसा भाषण नहीं कर सकता जैसा हनुमान् ने भाषण किया । निश्चय ही इन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण शास्त्र का
बहुत प्रकार से अध्ययन किया है । तभी बहुत बोलने पर भी किसी अपशब्द का उच्चारण नहीं किया । इन उद्धरणों
से स्पष्ट ही हनुमान् की वेद-वेदाङ्गविज्ञता सिद्ध होती है । वस्तुस्थिति तो यह है कि वे विद्याधिपति शिव ही हैं ।
उनके अनुग्रह से आज भी बड़े बड़े विद्वान् पैदा होते हैं । परन्तु बुल्के अपनी मनोवृत्ति का परिचय देते हुए
कहते हैं—"रामायण के कुशीलव ( गायक ) हनुमान् का ज्ञान-भण्डार बढ़ाते रहे हैं।" परन्तु आज के
रामायण गायक तो विचारे हनुमान् की कृपा से अपना ज्ञान-भण्डार बढ़ाते हैं, किन्तु हनुमान् का ज्ञानभण्डार
कोई मनुष्य कैसे बढ़ा सकता है ? बुल्के समझते हैं कि हनुमान् वस्तुतः वैसे नहीं थे, किन्तु व्यासों ने बढ़ाकर
वैसा वर्णन किया है । पर उनकी यह समझ भ्रान्तिपूर्ण ही है । भारतीय व्यास पाश्चात्यों के समान मिथ्या
इतिहास गढ़ने के अभ्यासी नहीं हैं । छन्दःशास्त्र के भी हनुमान् विद्वान् थे । बुल्के कहते हैं "इसी लिए
हनुमन्नाटक की रचना का श्रेय हनुमान् को दिया गया है।" पर बुल्के को यह सोचना चाहिये था कि कोई
भी ग्रन्थकर्ता के रूप में अपना ही नाम चाहता है । स्वयं ग्रन्थ लिखकर अपना उससे सम्बन्ध न जोड़कर अन्य
को रचयिता के रूप में प्रसिद्ध करना बुल्के के यहाँ प्रसिद्ध है ? तो फिर अपनी रामकथा को ही दूसरे की रचना
क्यों नहीं कहते ?
कहा जाता है कि वाल्मीकि महर्षि की रुचिरक्षा की दृष्टि से हनुमान् ने अपनी रचना को समुद्र में फेंक
दिया था । तुलसीदास ने विनयपत्रिका में वस्तुस्थिति के अनुसार ही हनुमान् को वेदवेदान्तविद् कहा है, केवल
उपाधि नहीं दी ।
अध्यात्मरामायण ( १।१।३२-५२ ) के अनुसार सीता और राम हनुमान् को वेदान्त का उत्कृष्ट तत्त्व
बतलाते हैं । मुक्तिकोपनिषद् तथा रामगीता में हनुमान् को उच्च दार्शनिक शिक्षा दी जाने का उल्लेख है । अद्भुत-
रामायण ( सर्ग १०-१५ ) में राम हनुमान् को अपना विष्णुरूप दिखा कर उन्हें सांख्ययोग तथा भक्तियोग का उपदेश
करते हैं । रामरहस्योपनिषद् अर्वाचीन नहीं अतिप्राचीन साक्षात् वेदस्वरूप है । उसके अनुसार हनुमान् सनकादिकों को
रामोपासना की पद्धति बतलाते हैं ।