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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 703

६२६ रामायणमीमांसा एकोनविंश
चिता में बैठने को तैयार हो गये । कृष्ण वहाँ बटु के रूप में पहुँचे । सारा हाल सुनकर बोले साक्षी के अभाव में आप
दोनों का काम व्यर्थ हुआ । मेरे सामने अपनी सामर्थ्य दिखाइये । अब की बार कृष्ण ने सेतु के नीचे अपना चक्र रख
दिया जिससे हनुमान् के भार से भी सेतु न टूटा । वे तुरन्त जान गये कि ये भगवान् हैं ।
किसी कथा के अनुसार भगवान् ने कच्छप-रूप धारण कर शरसेतु की रक्षा की । हनुमान् ने समझ
लिया । भगवान् ने कृष्णरूप में दर्शन देकर उनका आलिङ्गन किया ।
भगवान् ने सेतु भी समुद्र में डुबाकर अर्जुन का गर्व दूर किया । उस समय से हनुमान् अर्जुन की ध्वजा पर
विराजमान हुए । इन सब प्रमाणों के रहते बुल्के आदि कैसे महाभारत को प्राचीन मानकर रामायण पर उसका प्रभाव
बतलाते हैं, यही आश्चर्य है ।
तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार अर्जुन ने कृष्ण से कहा—मैं समुद्र पर सेतु बना सकता हूँ । राम ने सेतु
क्यों बनवाया ? कृष्ण ने कहा वह महाकाय वानर वीरों के लिए बनाया गया था। अर्जुन ने गर्व से कहा—मेरा सेतु
किसी भी भार का सहन कर सकता है। कृष्ण ने हनुमान् को बुलवाया । अर्जुन ने सेतु बनाया । पर वह हनुमान् के
चढ़ते ही चूर्ण हो गया । भगवान् ने वराहरूप से संभाला। हनुमान् ने कृष्ण के अनुरोध से महाभारत में अर्जुन के
ध्वजपर बैठना स्वीकार किया ।
कर्णदान काव्य में कहा गया है कि सारलादास के महाभारत कर्णपर्व के अनुसार कर्ण के साथ युद्ध करते
समय अर्जुन को गर्व हुआ कि कर्ण के बाण से मेरा रथ थोड़ा ही पीछे हटता है, किन्तु मेरे बाणों से कर्ण का रथ
चौगुनी दूरी तक पीछे हट जाता है । किन्तु कृष्ण ने यह कहकर कर्ण की ही प्रशंसा की कि कर्ण का रथ हल्का है और
यह रथ मेरु-मन्दर के तुल्य भारी है, इसपर सभी देवता विद्यमान हैं । ध्वज में हनुमान् हैं, फिर भी कर्ण इसे अपने
बाणों से हटा देता है ।
कृष्णावतार के समय भगवान् ने हनुमान् को बुलाकर द्वारका के किसी उपवन में निवास कराया । कृष्ण
ने सत्यभामा, सुदर्शन तथा गरुड़ तीनों का गर्व दूर करना चाहा । गरुड़ से कहा—अमुक वन में रहनेवाले वानर को
पकड़ लाओ । हनुमान् ने उन्हें ६०,००० योजन पार समुद्र में फेंक दिया । बाद में कृष्ण ने पुनः गरुड़ को भेजा
कि हनुमान् को द्वारका के राजभवन में आने का निमन्त्रण दे आओ स्वयं धनुर्धारी राम बन गये । सत्यभामा को सीता
का रूप धारण करने को कहा । सुदर्शन से कहा—सावधान ! कोई भी प्रवेश न करने पाये । हनुमान् गरुड़ के
बहुत पहले द्वारका पहुँच गये । सुदर्शन चक्र को मुख में रखकर राजभवन में प्रवेश किया । वे रामरूपी कृष्ण के
सामने नतमस्तक होकर तुरन्त पहचान गये कि सत्यभामा सीता नहीं है । कृष्ण ने हनुमान् को द्वारपाल
नियुक्त किया ।
दाशरथि (१८०६ ई०—१८४७ ई०) की पाञ्चाली के "सत्यभामा, सुदर्शनचक्र ओ गरुड़ेर दर्पचूर्ण"
अध्याय के अनुसार कृष्ण ने गरुड़ को हिमालय से एक नील कमल लाने को भेजा । वहाँ उनका हनुमान् से युद्ध हुआ ।
हनुमान् ने गरुड़ को काँख में दबाकर एक नील कमल के साथ द्वारका के लिए प्रस्थान किया । सुदर्शन ने हनुमान् को
महल के द्वार पर रोकने का प्रयास किया, किन्तु सुदर्शन हनुमान् का एक बाल भी बाँका न कर सके । उन्होंने अपनी
हार मान ली । इतने में कृष्ण ने यह देखकर कि हनुमान् आ रहे हैं राम का रूप धारण कर लिया । सत्यभामा को
सीता का रूप धारण करने को कहा, किन्तु वह समर्थ नहीं हुईं । रुक्मिणी ने सीता का रूप धारण किया । सत्यभामा
और उनकी सखियाँ उनकी हँसी उड़ाने लगीं । हनुमान् ने राम के चरणों पर नील कमल रखकर गरुड़ को काँख से
निकाल दिया । ऐसी कथाएँ अन्यत्र भी हैं ।