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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 700

अध्याय उत्तरकाण्ड ६२३
पुराणों पर आधारित कथाओं का वाल्मीकिरामायण के साथ समन्वय करना उचित है । वायु का
सम्बन्ध प्रायः सब कथाओं से जुड़ा है। तुलसीदासजी ने भी हनुमान् चालीसा में हनुमान् को "शंकरसुवन केसरी-
नन्दन" कहा है ।
शिव का तेज शिवस्वरूप ही है । वायु, अग्नि आदि सभी ईश्वर की शक्ति से ही शक्तिमान् होते हैं । जैसे
शिव-तेज धारणकर अग्नि ने उसे गङ्गा में निहित किया था उसी तरह शिवतेज धारणकर वायु ने अञ्जना में निहित
किया है । अञ्जना गौतमपुत्री थी । उससे भी पहले पुञ्जिकस्थला अप्सरा थी, जो भी हो, वह शाप वश वानरी हुई ।
सेरीराम के अनुसार गौतम ने पुत्री अञ्जना को शाप दिया कि सौ वर्ष तक मुख बाकर सुई की नोक पर
समुद्र के बीच में खड़ी रहो । वनवास के समय राम, लक्ष्मण और सीता एक स्थल पर पहुँचे जहाँ दो सरोवर थे ।
एक ऋषि ने कहा—स्वच्छजलवाले सरोवर में स्नान करने से मनुष्य पशुरूप धारण कर लेते हैं । पङ्किल जलवाले
सरोवर में स्नान करने से पुनः मनुष्य बन जाते हैं। राम और सीता ने स्वच्छजलवाले सरोवर में स्नान कर लिया
और दोनों वानर-वानरी हो गये । वृक्षों पर क्रीडा करने लगे, जिससे सीता गर्भिणी हो गयी । लक्ष्मण ने बड़ी
कठिनाई से पुनः दोनों को पङ्किल जलवाले सरोवर में नहलाया तब वे पुनः मनुष्यरूप बन गये। राम ने सीता का
भ्रूण निकाल दिया । वायु ने उसे सुई की नोक पर खड़ी अञ्जनी के मुख में रख दिया। बाद में अञ्जनी ने कुण्डलों
से अलङ्कृत हनुमान् को जन्म दिया । सेरीराम के अन्य पाठानुसार अञ्जनी को देखकर राम अनुरक्त होते हैं, अपने
तेज को वायु के द्वारा अञ्जना के मुख में रखवाते हैं ।
रामजातक के अनुसार सीता को खोजते समय राम एक फल खाने से वानर बन जाते हैं। अञ्जनी ने
भी वही फल खाया वह भी वानरी हो गयी । दोनों हनुमान् को उत्पन्न करते हैं । हनुमान् के प्रति सीता और राम
दोनों का वात्सल्य था । इसी आधार पर यह कथा बनी है । ईश्वर ही हिरण्यगर्भ तथा विराट् बनकर मनु-शतरूपा
रूप में विभिन्न प्राणियों के रूप में सम्पूर्ण विश्व के प्राणियों का निर्माण करते हैं । फिर भी मर्यादापुरुषोत्तम राम
एकपत्नीव्रत पालन करते हैं । वाल्मीकिरामायण में वर्णित राम और सीता के आदर्श के विपरीत कथाओं का वाच्यार्थ
में प्रामाण्य नहीं है । पूर्वोक्त लक्ष्यार्थ में तो कोई विरोध नहीं है । वस्तुतः बौद्धजातक और उनके अनुसार उलटी
सीधी गढ़ी गयी कथाओं का किसी प्रकार प्रामाण्य नहीं है ।
दशरथयज्ञ के पायस का एक अंश अञ्जना को प्राप्त हुआ था । उससे हनुमान् का जन्म होना उनकी
विष्णुरूपता में भी प्रमाण है ( आ० रा० १।१।१०४-१०७) ।
सुवर्चला अप्सरा को नृत्य-दोष के कारण ब्रह्मा ने गृध्री होने का शाप दिया तथा उसे यह वरदान दिया
कि कैकेयी का पायस अञ्जनी पर्वत पर फेंकने पर वह पुनः अप्सरा हो जायगी । समय आने पर गृध्री ने कैकेयी के हाथ
से कुछ पायस छीनकर अञ्जनी पर्वत पर फेंका और अप्सरा होकर स्वर्ग चली गयी । वह पायस अञ्जना को मिला ।
उससे हनुमान् का जन्म हुआ । उसी रचना में अन्य स्थल पर उसके बाद वायु से भी सम्पर्क हुआ, जिससे हनुमान्
की उत्पत्ति हुई । भावार्थरामायण में इसका समन्वय मिलता है । सुवर्चला अप्सरा शापवशात् गृध्री हुई । कैकेयी से
पायस का कुछ अंश छीनकर उसे खाकर वही वानरी बन गयी । वानरी के रूप में वह गौतम की पुत्री और केसरी
की पत्नी बन गयी । पायस खाने के फलस्वरूप हनुमान् का जन्म होता है ( बालकाण्ड २-२ तथा किष्किन्धा-
काण्ड १-१०) ।
वाल्मीकिरामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों के अनुसार हनुमान् केसरी के क्षेत्रज और वायु के औरस पुत्र
हैं । अञ्जना उनकी माता है । बुल्के के अनुसार विशेषताओं की दृष्टि से वायु-पुत्र उनकी काल्पनिक उपाधि नहीं है ।