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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 696, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 696

प्रसिद्ध हुए। रामायण में हनुमान् के निम्नलिखित नाम सर्वाधिक प्रयुक्त हुए हैं—मारुतात्मज, मारुति, पवनात्मज,
वायुपुत्र, वायुसूनु, वायुसुत तथा अनिलात्मज इनके अतिरिक्त वातात्मज, मारुत, पवनसुत, अनिलसुत ये नाम भी कई
बार आये हैं। वायुनन्दन, वायुसम्भव, मारुतनन्दन, वासवदूतसूनु, गन्धवहात्मज नाम एक एक बार आये हैं ।
हनुमान् की उत्पत्तिविषयक उपाधियों का बाहुल्य तथा केसरी अथवा अञ्जना के उल्लेख का अभाव देखकर दृढ़
धारणा बनती है कि वाल्मीकिरामायण के गायक बहुत दिनों तक हनुमान् को वायुपुत्र ही मानते थे और उस कथा
से अनभिज्ञ थे जिसके अनुसार हनुमान् केसरी की पत्नी अथवा अञ्जना की सन्तान हैं।
बालकाण्ड में जहाँ देवताओं द्वारा अप्सराओं, गन्धर्वियों और वानर-वानरियों से वानर और ऋक्षों की
उत्पत्ति का वर्णन किया गया है वहाँ मारुत को ही हनुमान् का पिता माना है।" अतः बुल्के का उक्त तर्क स्वयं ही
सापेक्ष एवं आधाररहित है। हनुमान् वायुपुत्र हैं यह तो सिद्धान्त में भी मान्य ही है। परन्तु वायु पवन देवता हैं।
उनसे किसी वानरी में हनुमान् का वानररूप में जन्म मानना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में प्रमाणसिद्ध का परित्याग
कर अप्रसिद्ध की कल्पना करना न्यायविरुद्ध है —
“उपस्थितं परित्यक्त्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात् ।”
वैसे सामान्यकल्पना भी विशेषपर्यवसायिनी होती है। इस तरह जब अञ्जना वानरी हनुमान् की माता
सिद्ध हो जाती है तब उसके जिस किसी भी पति की कल्पना करनी होगी। पर जब यहाँ भी केसरी उसका पति
प्रसिद्ध है तब पत्यन्तर की कल्पना भी निरर्थक ही है। प्रभावशाली भी वानर की अपेक्षा वायुदेवता का प्राणरूप से,
हिरण्यगर्भरूप से एवं अष्टमूर्ति शिव का रूप होने से महत्त्व अधिक है। इसी लिए वातात्मज आदि नामों का अधिक
प्रयोग हनुमान् के लिए हुआ है और यह उपाधि नहीं वस्तुस्थिति है। इस वस्तुस्थिति के रहते हुए भी अञ्जना-सुत
केसरी-नन्दन आदि के साथ उसका विरोध नहीं है। जैसे—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन आदि की धर्मपुत्र, इन्द्रसूनु तथा
पवनात्मज के रूप से प्रसिद्धि होने पर भी उनके कौन्तेय एवं पाण्डव होने में कोई बाधा नहीं पड़ती है ।
बुल्के यह भी कहते हैं कि "उत्तरकाण्ड की जन्मकथा में अञ्जनीसुत मिलता ही है । किन्तु वह दाक्षिणात्य
पाठ में ही मिलता है। गौड़ीय और पश्चिमोत्तरीय पाठों में नहीं मिलता है। समानान्तर स्थलों में इसका अभाव
है। अतः यह प्रक्षेप ही है।" किन्तु उनका यह प्रलाप ही है, कारण जब पूर्व कथन के अनुसार तीनों पाठों में केसरी
नाम मिलने पर भी उसे क्षेपक मानने में हिचक नहीं फिर किसी पाठ में न मिलने का अन्तर ढूंढ़ना क्या अज्ञता
नहीं है। सिद्धान्त में तो तीनों ही पाठ प्रमाण हैं, अतः प्रक्षेप होने का प्रश्न ही नहीं उठता।
“तथा केसरिणा त्वेष वायुना सोऽञ्जनीसुतः ।
प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येष वानरः ॥” (वा०रा०दा०पा० सर्ग ३६)
“यदा केसरिणा ह्येष वायुनाञ्जनया तथा ।
प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येष वानरः ।।” ( प० पा० सर्ग ३९)
“यदा केसरिणा त्वेष वायुना स्वजनैः सह ।
प्रतिषिद्धोऽपि मर्यादां लङ्घयत्येष वानरः ॥” ( गौ० पा० सर्ग ४० )
भले ही समानान्तर स्थल में न हो। परन्तु उपर्युक्त तीनों ही पाठों में केसरी एवं अञ्जना का नाम है
ही । इनके प्रक्षेप होने में भी कोई प्रमाण नहीं है । श्लोकार्थ यह है कि जब केसरी एवं वायु तथा अञ्जना के द्वारा
प्रतिषेध करने पर भी यह हनुमान् वानर मर्यादा का उल्लङ्घन करता है । अर्थात् हनुमान् आश्रमों में ऋषियों के स्रुक्
तथा वल्कलों को नष्ट कर देते थे । तब ऋषियों ने मृदु कोप से ही शाप दे दिया कि दीर्घकाल तक तुम अपने महान्
बल पराक्रम को भूले रहोगे जब कोई तुम्हें तुम्हारे बल का स्मरण करायेगा तब तुम्हारा बल—तेज बढ़ेगा ।