सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 637, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 637

की सम्यक् सेवा बिना किये वैसी बात नहीं कही जा सकती है तो भी इस सम्बन्ध में मुझे कुछ सूक्ष्मतर
बात प्रतीत होती है। भ्रातृ-त्यागरूप दोष सभी राजाओं में प्रत्यक्षसिद्ध है और सब लोकों में प्रसिद्ध होने से
वह लौकिक ही है।
लोक-स्थिति यह है कि राजाओं के अमित्र (शत्रु) दो प्रकार के होते हैं। एक तो तत्कुलीन अर्थात्
उनकी ज्ञाति के लोग और दूसरे आसन्न देशवासी लोग । ये दोनों ही प्रकार के शत्रु आध्यात्मिकादि त्रिविध कष्टों के
द्वारा प्रहार करते हैं। अतः नाना प्रकार के उत्पीड़क प्रहर्त्ता ज्ञातिजनों के भय से स्वात्मत्राणार्थ विभीषण का शरण में
आना सम्भव है अथवा व्यसन में प्रहार करनेवाले स्वजातीय होने के कारण व्यसनी रावण पर प्रहार करने की दृष्टि
से उसका आना सम्भव है। केवल ज्ञातिमात्र का होना ही शत्रुता का प्रयोजक नहीं होता, किन्तु परस्पर अनिष्ट
चिन्तन के कारण भी शत्रुता होती है। परस्पर अनिष्ट चिन्तारहित पापशून्य लोग परस्पर हितैषी होकर अपने हित
का रक्षण करते हैं, परन्तु राजाओं की स्थिति इससे भिन्न होती है। उनमें तो शोभन मित्र भी ज्ञाति के व्यक्ति
शङ्कनीय होते हैं, क्योंकि उन्हें भी महत्तर राज्य एवं ऐश्वर्य का लोभ होना सम्भव होता है। भेदनीति का प्रभाव
भरत की माता कैकेयी आदि में भी देखा गया है। इस दृष्टि से अपने से शङ्कित रावण से अनिष्ट की सम्भावना से
रावण को त्याग कर विभीषण आया होगा।
“यो हिंसार्थमभिक्रान्तं हन्ति मन्युरेव मन्युं स्पृशति न तस्मिन् दोषः ।”
इस आपस्तम्ब-वचन के अनुसार जो हिंसार्थ उद्यत शत्रु का हनन करता है। मन्यु ही मन्यु का हनन
करता है, इस दृष्टि से यदि रावण के नाशार्थ विभीषण आया है तो भी दोष नहीं है। शत्रुपक्ष के परिग्रह में जो दोष
कहा गया है उसका भी समाधान यह है कि हम लोग न रावण के जातीय हैं और नहीं उसके प्रतिदेश्य हैं। अतः
हममें राज्य की जिघृक्षा नहीं हो सकती है। इसलिए हम लोगों में प्रहार की कल्पना नहीं हो सकती। किन्तु हम
लोगों के द्वारा स्वजाति शत्रु का विनाश कर निज राज्य की आकाङ्क्षा हो सकती है। अतः हम लोगों पर प्रहार
करना उपजीव्य-विरोध ही होगा। यद्यपि तमःप्रधान मूर्ख राक्षसों में ऐसा विचार करना कम सम्भव है तथापि
पर्यालोचनापूर्वक कर्त्तव्यनिश्चय में समर्थ पण्डित सर्वत्र ही होते हैं। एकपितृजन्य होने पर भी जैसे कुम्भकर्ण अति-
तामस है, रावण अतिराजस है, इसी तरह विभीषण अतिसात्त्विक होने से ऐसा विचार विभीषण में असम्भव नहीं है,
अतः विभीषण ग्राह्य है !
अव्यग्र, अनाकुल तथा प्रहृष्ट सौभ्रात्र से परस्पर मिलजुल कर रहते हैं। परन्तु विपरीत जातीय लोग
राज्य-लोभादि से भेदभाव को प्राप्त होते हैं। तभी उनमें युद्धादि कोलाहल होता है। सौभ्रात्र के अपगत होने पर
किसी हेतु से वैर उत्पन्न हो जाने से शरण में आना सम्भव ही है। कहा जा सकता है कि भरत आदि भ्राताओं में
ऐसा दोष नहीं देखा जाता है। उन्होंने तो प्राप्त राज्य का भी परित्याग करके सौभ्रात्र को निभाया है। परन्तु भरत
के समान प्राप्त राज्य को त्याग कर सौभ्रात्र निभानेवाले भ्राता, मेरे तुल्य सुखलोभ से पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन
न करनेवाले पुत्र और कपिराज सुग्रीवादि जैसे सब सुख त्याग कर सर्व बल से तथा सब यत्नों से मित्रकार्यसाधक
सुहृद् सब नहीं हो सकते—
“न सर्वे भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमाः ।
मद्विधा वा पितुः पुत्राः सुहृदो वा भवद्विधाः ॥” ( वा० रा० ६।१८।१५ )
राम के ऐसे वचनों को सुनकर लक्ष्मण सहित महाप्राज्ञ सुग्रीव ने प्रणत होकर कहा कि विभीषण रावण
द्वारा भेजा हुआ गुप्तचर ही है। अतः उसका निग्रह करना ही उचित है। यह कुटिलबुद्धि से संदिग्ध होकर आया
हुआ है। विश्वास प्राप्त कर लेने पर आपपर या विश्वस्त होने से मुझपर या लक्ष्मण पर प्रहार कर सकता है,