रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 592, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५१५
ने हनुमान् को उनके जन्म की कथा सुनाते हुए समुद्र-लङ्घन का आदेश दिया । हनुमान् की महिमा सुनकर सब वानरों
ने विषादरहित होकर हनुमान् की स्तुति की । संस्तुत होकर महाबल हनुमान् महान् तेज से पूर्ण होकर अपने स्वाभा-
विक बल का स्मरण करके बोले—मैं समुद्र पार जाकर भूमि का स्पर्श किये बिना पुनः लौट सकता हूँ । गरुड़, वायु
और मेरी शक्ति समान है। इन दोनों को छोड़कर कोई भी मेरी गति का अनुसरण नहीं कर सकता । बादलों से
उदित विद्युत् के समान में निमेषान्तरमात्र में निरालम्बन आकाश में उत्पतन कर सकता हूँ ।
सौ योजन ही नहीं हजारों योजन जाना मेरे लिए कुछ कठिन नहीं है। इन्द्र या ब्रह्मा के हाथ से अमृत
लाऊँ या लङ्का को ही उठा लाऊँ । जाम्बवान् ने आश्वस्त करके कहा कि सीता का समाचार लेकर शीघ्र आ जाओ ।
तुम्हारे आने तक हम सब तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे । बुल्के ने यहाँ भी प्रक्षेप की कल्पना की है, जिसका निराकरण
पीछे किया जा चुका है ।
सम्पाति की कथा के सम्बन्ध में बुल्के कहते हैं कि सम्पाति की कथा दो बार आयी है। प्रथम के अनुसार
वृत्र-वध के बाद सम्पाति और जटायु दोनों भाई इन्द्र पर विजय प्राप्त करने के लिए आकाश-मार्ग से स्वर्ग जा रहे
थे । सूर्यमण्डल के समीप पहुँचने पर जटायु को प्रचण्ड सूर्य किरणों से संत्रस्त देखकर सम्पाति ने अपने पक्षों से उसे
ढँक लिया । फलतः सम्पाति के पक्ष जल गये और वह विन्ध्यगिरि पर गिर गया। बाद में सम्पाति को जटायु के
सम्बन्ध में कुछ समाचार नहीं मिला । द्वितीय अपेक्षाकृत विस्तृत कथा में कहा गया है पहले सम्पाति जटायु के साथ
निशाकर मुनि के पास जाया करता था । अतः पक्ष जलने के बाद भी सम्पाति निशाकर से भेंट करने गया था। वहाँ
पहुँचकर उसने निशाकर से कहा हम दोनों भाई शक्ति-परीक्षा के लिए आकाश में सूर्य की ओर बढ़ने लगे । सूर्य के
पास पहुँच कर हम दोनों भयभीत हो गये । जटायु पहले गिर गया । सम्पाति के पक्षों से सुरक्षित होकर वह जन-
स्थान में सकुशल पहुँच गया । सम्पाति निःसहाय होकर विन्ध्य पर गिर गया उसने देहत्याग का विचार किया पर
निशाकर ने उसे आश्वासन दिया कि राम के दूत सीता की खोज करने इधर आयेंगे। तुम उनको सीता का समाचार
दोगे तब अपने पक्ष पुनः प्राप्त करोगे । कथा सुनाते सुनाते सम्पाति ने अनुभव किया कि उसके पक्ष बढ़ रहे हैं । उसने
इसका श्रेय निशाकर को दिया ( सर्ग ६०-६३ ) । अन्य पाठों में भी सम्पाति निशाकर को ही अपने स्वास्थ्य-लाभ
का श्रेय देता है । पर वानर इसे राम और लक्ष्मण का प्रभाव मानते हैं । आकाशवाणी ने वानरों के कथन का
समर्थन किया ।
बुल्के द्वितीय वृत्तान्त को प्रक्षेप मानते हैं । इसी लिए उन्होंने दोनों कथाओं में परस्पर विरुद्ध बातों को
दिखलाने का प्रयत्न किया है । परन्तु उनका यह प्रयत्न निराधार है, क्योंकि प्रथम कही हुई संक्षिप्त कथा का ही
दूसरा विस्तृत रूप है । दोनों के अक्षरों पर ध्यान दिया जाता तो विरोध भी प्रतीत न होता । तिलक व्याख्याकार ने
दोनों कथाओं का समन्वय किया है ।
“पुरा वृत्रवधे वृत्ते स चाहं च जयैषिणौ ।
आदित्यमुपयातो स्वो ज्वलन्तं रश्मिमालिनम् ॥” ( वा० रा० ४।५८।४ )
पुराकाल में वृत्रवध के अनुसार इन्द्र को अति प्रबल जानकर उनको जीतने के लिए जटायु और मैं दोनों
स्वर्ग गये । गरुड़ के समान शीघ्र ही इन्द्र को जीतकर लौटते समय दर्प से दोनों आदित्य के पास गये । हम दोनों
में जटायु अवसाद को प्राप्त होने लगा । मैंने स्नेह से परम विह्वल जटायु को अपने पक्षों से बचाया—
“आवृत्त्याकाशमार्गेण जवेन स्वर्गंतौ भृशम् ।
मध्ये प्राप्ते तु सूर्ये तु जटायुरवसीदति ॥” ( वा० रा० ४।५८।५ )