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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 587

सुमेरु-पर्वत को पूर्ववत् सीधा कर देने के पुरस्कारस्वरूप वाली को एक त्रिशूल और सुग्रीव को तारा मिली थी । किन्तु
वाली ने छिपाकर तारा से विवाह कर लिया । दुन्दुभि वध के अतिरिक्त रावण की पराजय भी वाली ने की थी ।
सुग्रीव ने दुन्दभि के अस्थिनिचय तथा सप्त तालों को दिखला कर राम से कहा था इनको वाली एक ही
समय में निष्पत्र कर देता था । सुग्रीव का अभिप्राय समझकर राम ने पादाङ्गुष्ठ से दुन्दुभि के अस्थि-कङ्काल को
दस योजन दूर फेंक दिया और राम का एक बाण सप्त तालों का भेदन कर गिरिप्रस्थ सप्त भूमि का भेदन करके पुनः
तूणीर में प्रविष्ट हो गया ।
नृसिंहपुराण के अनुसार वे सप्तताल एक सर्प की पीठ पर चढ़कर स्थित थे । आनन्दरामायण के अनुसार
वाली ने किसी गुफा में तालवृक्ष के फल रखे थे। कोई उनमें से सात ले गया। वाली ने गुफा में एक सर्प देखा
और उसे ही चोर समझ कर शाप दिया कि तुम्हारे शरीर पर सात ताल के वृक्ष उत्पन्न होंगे । सर्प ने प्रतिशाप
दिया था कि जो उनको काटेगा वही तुम्हारा घातक होगा । राम ने शेषांश लक्ष्मण के पैर को अपने पैर से दबाकर सर्प
को सीधा कर दिया और एक बाण से सातों को काट डाला । सुग्रीव ने फिर भी कहा कश्यप ने महती तपस्या से माला
प्राप्त कर वह माला इन्द्र को दी थी । इन्द्र ने वही माला वाली को प्रदान कर दी । उसे देखते ही शत्रुगण युद्ध में
बलहीन हो जाते हैं । वाली सदा माला को पहने रहता है । राम ने शापमुक्त उसी सर्प को आदेश दिया कि वह माला
चुराकर ले जाये । सर्प ने माला चुराकर इन्द्र को दे दी । तभी सुग्रीव वाली से द्वन्द्वयुद्ध के लिए प्रस्तुत हुआ ।
तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार राम ने सुग्रीव को विश्वरूप दिखाया और ज्ञानमुद्रा तथा रामसहस्रनामस्तोत्र
बताया । सेरीराम के अनुसार राम ने अपने एक बाण से सहस्र वन काट डाले । उस समय उनके धनुष की टङ्कार
से सुग्रीव आदि मूच्छित हो गये थे ।
इन अनेक उद्धरणों का तात्पर्य यही है कि वाली महान् पराक्रमी था । उसके वध में अनेक प्रतिबन्ध थे,
इसी लिए सुग्रीव भयभीत होकर राम की विशिष्ट सामर्थ्य के सम्बन्ध में पूर्ण आश्वस्त होकर ही द्वन्द्वयुद्ध में प्रवृत्त हुआ
था । राम ने उसकी इच्छा से बहुत अधिक अपनी सामर्थ्य सिद्ध कर दिखायी ।
वाली का वध
प्रथम द्वन्द्वयुद्ध में दोनों के एकरूप होने के कारण राम ने बाण नहीं छोड़ा । जिससे पराजित होकर
सुग्रीव को ऋष्यमूक लौट जाना पड़ा । दूसरी बार राम ने सुग्रीव के गले में गजपुष्प की माला पहना दी । दुबारा
सुग्रीव का आह्वान सुनकर तारा के अनुरोध को ठुकराकर वाली पुनः निकला । सुग्रीव से द्वन्द्वयुद्ध करते समय राम-
बाण से आहत होकर वाली गिर पड़ा (सर्ग १३-१६) । अनन्तर के दो ( १७, १८ ) सर्गों को बुल्के प्रक्षिप्त कहते
हैं । इसका खण्डन पीछे किया जा चुका है ।
बुल्के ५१९ वें अनु० में कहते हैं, महाभारत के रामोपाख्यान में एक ही द्वन्द्वयुद्ध मिलता है । संक्षिप्त
संकलन के नाते यह ठीक ही है, पर इससे वाल्मीकिरामायण में वर्णित दो द्वन्द्वयुद्धों का अपलाप नहीं किया
जा सकता ।
विभिन्न अन्य राम-कथाओं में सुग्रीव को पहिचानने के लिए उसकी पूंछ में दर्पण तथा कमर में एक जड़
का लपेटना आदि भी उक्त है। सेरीराम के अनुसार वाली ने बाण हाथ से पकड़ लिया था। राम की निर्दोषता सिद्ध
होने पर विष्णुस्वरूप राम के बाण की अमोघता के लिए बाण छोड़ दिया और वह छाती में घुस गया । आहत वाली
ने राम का हाथ पकड़ कर अपनी पुत्री और पुत्र को सौंप दिया । राम ने वाली को जीवित रखना चाहा, पर उसने
स्वीकार नहीं किया। पद्मपुराण (४।१११।१६७) में कहा गया है कि मरने के पूर्व वाली ने राम को उनका बाण
लोटा दिया था ।