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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 577

५०० रामायणमीमांसा पञ्चदश
ही है। इसकी सत्यता में उपवासकृशा यह वचन बाधक नहीं है, क्योकि महीनों तक भोजन के बिना रहने की कल्पना
की अपेक्षा यह कहीं स्वाभाविक है कि इन्द्र के द्वारा आनीत दिव्य पायस को ग्रहण कर लङ्का का फल, जल, अन्न
आदि न लेकर सीता रही होंगी। स्वाभाविक रूप से अन्न, जल न लेना उपवास ही है। उससे भी कृशता होती है।
लोक में अन्नादित्याग में भी उपवास पद का प्रयोग होता है।
“उपवासेन शोकेन ध्यानेन च भयेन च।
परिक्षीणां कृशां दीनामल्पाहारां तपोधनाम् ॥” (वा० रा० ५।१९।२० )
इसी लिए अल्पाहारा कहा गया है। अर्थात् एक बार लिये हुए पायस पर ही उनका जीवन चल रहा था।
क्षीणता के और कई कारण वहीं कहे गये हैं : उपवास, शोक, चिन्ता एवं भय से सीता परिक्षीण एवं कृश थीं।
मायासीता
५०१ अनु० में बुल्के कहते हैं, “वाल्मीकिरामायण में सीता-हरण का जो चित्र खींचा गया है वह बीभत्स
कहा जा सकता है", परन्तु सच्ची घटना का वर्णन इतिहास में अपेक्षित होता है। रावण बाये हाथ से पद्माक्षी सीता
के बालों को पकड़ कर दायें हाथ से जंघाओं को वकड़ कर रथ पर बैठाता है—
“वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण च।
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥” ( वा० रा० ३।४९।१ ७)
तिलककार के अनुसार वेदवती के अंश से दिये हुए शाप के अनुसार समूल विनाश करने की दृष्टि से
सीता न तत्काल शाप से रावण को दग्ध नहीं किया। दूसरे यह भी दृष्टि थी कि ऋषियों के समक्ष राम ने राक्षसों
के वध की भी प्रतिज्ञा की थी, उसकी पूर्ति अपेक्षित थी। रावण ने वाम हाथ से बालों को पकड़ कर बैठाना इसलिए
भी उचित समझा था कि अनन्यपतिव्रता के स्पर्श से शाप का भी भय था—
“स्ववामाङ्गासनत्वनिवारणायैवं ग्रहणमित्याहुः ।”
स्ववामाङ्ग में आसन निवारण के लिए रावण ने उस प्रकार सीता का ग्रहण किया। पर फिर भी भक्ति-
भावना के अनुकूल अन्य कथाकारों ने उसे बचाने का प्रयत्न किया है। अतएव नृसिंहपुराण के अनुसार बिना स्पर्श
किये ही सीता का रथारोहण वर्णन किया गया है। तत्त्वसंग्रहरामायण ( ३।१५ ) में रावण पृथ्वी को खोदकर
भूभाग सहित सीता को रथ पर बैठाता है। तमिलरामायण ( ३।२ ) के अनुसार एक योजन की गहराई तक पृथ्वी
खोदकर पर्णशाला सहित सीता को रथ पर रखकर रावण लङ्का ले गया है। परस्त्रीस्पर्श से तुम मर जाओगे, इस
शाप से डर कर उसने वैसा किया था। अध्यात्मरामायण के अनुसार—
ततो विदार्य धरणीं नखैरुद्धृत्य बाहुभिः ।
तोलयित्वा रथे क्षिप्त्वा ययौ क्षिप्रं विहायसा ॥” ( अरण्यका० सर्ग ७ )
रावण नख से धरणी का विदारण कर, बाहु से उठाकर तथा रथ पर रखकर आकाश मार्ग से चला गया।
प्रसन्नराघव में गोदावरी आदि अन्य नदियाँ सागर को सीता-हरण की कथा सुनाती हैं। सागर पूछता
है— अपि नाम मम वधूटिका स्पृष्टा निशाचरेण” क्या मेरी वधूटिका ( पुत्रवधू ) का निशाचर ने स्पर्श किया था ?
गोदावरी ने उत्तर दिया—'न स्पृष्टा' स्पर्श नहीं किया और कहती है, जब रावण ने सीता पर हाथ डालना चाहा
तब अनसूया का दिया हुआ अङ्गराग अग्नि के रूप में सीता का आवरण बन गया। तब रावण ने वरुणमन्त्र द्वारा
बादल बुलाया और उस बादल रूपी अञ्चल से ढक कर सीता को ले गया। वस्तुतस्तु मायामयी सीता का ही अपहरण
रावण कर सकता था। वास्तविक सीता ने अग्नि में निवास किया था।