रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय अरण्यकाण्ड ४९५
युद्ध करते समय लक्ष्मण को सीता की रक्षा के लिए नियुक्त किया ही गया था, अतः दोनों भाई सीता को छोड़कर
सामान्य मृगया के लिए गये होंगे, यह कल्पना कोई भी समझदार कर ही नहीं सकता है।
उसी हालत में उन्हें रावण ले गया । "चरन्तीं विजने वने" का यही सरल अर्थ है। विरोधी राक्षसों से
आकीर्ण उस घोर वन में अकेले सीता के टहलने का प्रश्न ही नहीं उठ सकता था। चर धातु के गति और भक्षण
दोनों अर्थ हैं। गति के अर्थ ज्ञान और गमन दोनों ही हैं। प्रतीक्षा भी ज्ञान ही है। अतः वन में राम की प्रतीक्षा
करती हुई सीता को रावण ले गया था। रामचरित में रामायण मुख्य प्रमाण है, अतः पुराण के आधार पर रामायण
के किसी अंश का अपमान या अपलाप नहीं किया जा सकता। अपितु रामायण के अनुसार पुराण का ही अर्थ निर्णय
करना उचित है।
४९१ वें अनु० में "महाभारत के रामोपाख्यान में सीता-हरण के समय रावण के रथ का निर्देश नहीं
मिलता। वाल्मीकिरामायण के एक स्थल से भी यह आभास मिलता है कि संभवतः मूल कथा में रथ का उल्लेख नहीं
था। किष्किन्धाकाण्ड में सम्पाति अपने पुत्र सुपार्श्व का वृत्तान्त हनुमान् आदि वानरों को सुनाता है कि सुपार्श्व महेन्द्र
की घाटी को रोकते हुए पहरा दे रहा था ( वा० रा० ४।४९।१२ ) । उसने देखा कि कोई एक सुन्दर स्त्री को
लिये जा रहा है। सुपार्श्व ने उन दोनों को अपने पिता के भोजन के लिए ले जाने का निश्चय किया था, किन्तु
उसने विनीत भाव से मार्ग माँगा। सुपार्श्व ने उसे जाने दिया ( श्लोक १४, १५) ।" वस्तुतः सर्वतोऽभिशङ्की
प्राणी को भोजन-पान में भी विष की शङ्का बनी ही रहती है। विशेषतः जिन लोगों के यहाँ सर्वत्र झूठ का ही
बोलबाला हो, वे लोग कभी यह विश्वास ही नहीं कर सकते कि ऋषि-महर्षि लोग झूठ नहीं बोलते थे। आर्ष ग्रन्थ
तत्तत् देवताओं का वाङ्मयस्वरूप ही होता है। उसमें से कुछ अंशों को निकालना वाङ्मयस्वरूप का अङ्ग-विच्छेद
करना है। नवीन वस्तु डाल देना कण्टक चुभाने के तुल्य है। बुल्के इतने दोष-दृष्टि-परायण हैं कि उन्हें सर्वत्र
क्षेपक ही क्षेपक दिखायी देते हैं। अन्यथा ( वा० रा० ३।४९।२० ) में स्पष्ट कहा गया है कि रावण ने सीता को
रथ में चढ़ाया—
"अङ्केनादाय वैदेहीं रथमारोपयत्तदा ।"
तथा सर्ग ५१ में भी स्पष्ट कहा गया है कि जटायु ने उसके रथ को तोड़ डाला—
"मणिसोपानचित्राङ्गं बभञ्ज च महारथम्" ॥१६॥
"स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः" ॥१८॥
उसके धनुष, रथ, अश्व, सारथि सभी जटायु ने छिन्न-भिन्न कर दिये एवं मार दिये थे। सर्ग ५२ में
यह भी स्पष्ट है कि राम और लक्ष्मण का नाम लेकर रोती हुई सीता को लेकर आकाश-मार्ग से रावण लङ्का की
ओर गया—
"जगामादाय चाकाशं रावणो राक्षसेश्वरः" ॥१३॥
अब ऐसी स्थिति में यदि सुपार्श्व ने बिना रथ के ही सीता को ले जाते हुए रावण को देखा तो इसमें
विरोध का प्रसङ्ग ही कहाँ है ? क्योंकि रथ तो जटायु ने खत्म ही कर दिया था। पर बुल्के तो दुनिया को धोखा देने
पर ही तुले हुए थे।
"तत्र कश्चिन्मया दृष्टः सूर्योदयसमप्रभाम् ।
स्त्रियमादाय गच्छन् वै भिन्नाञ्जनचयोपमः ॥" ( वा० रा० ४।५९।१४ )