रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरावण से सीता का सौन्दर्य-वर्णन करत हैं। तभी वह सीता-हरण में प्रवृत्त होता है। १८ वीं शती के उसी वृत्तान्त
के अनुसार राम ने चित्रकूट में पहुँच कर अपने बहुत शिष्यों को पुनर्जन्म का सिद्धान्त सिखाया था। वे सिंहल में
भी अपने सिद्धान्त का प्रचार चाहते थे। रावण ने इसका विरोध किया और राम को पराजित करके सीता को
छीन लिया। विभीषण की सहायता से राम ने ब्रह्मा द्वारा भेजी गयी सेना से रावण को जीत लिया
(पाश्चात्यवृ० न० १२)।
उक्त कथाएँ वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध विकृति तथा विपर्यास के ही परिणाम हैं। रावण स्वयं भी
पुनर्जन्म का सिद्धान्त माननेवाला था। वह वैदिक आहिताग्नि था।
रावण ने सनत्कुमार से यह सुना था कि भगवान् विष्णु का क्रोध भी वर के तुल्य होता है—क्रोधोऽपि
देवस्य वरेण तुल्यः” (वा० रा० दा० प्र० २।२२), अतएव विष्णु द्वारा मारे जानेवाले लोगों को परम धाम मिलता
है। मुनि के यह बतलाये जाने पर कि त्रेतायुग में नारायण रामरूप में प्रकट होंगे। वह पिता की आज्ञा से लक्ष्मीरूप
सीता के साथ वनवास करेंगे; अतः रावण ने राम के हाथ से मरण की कामना से ही सीता का हरण किया था—
“अपहृता सीता त्वत्तो मरणकाङ्क्षया ।” (वा० रा० दाक्षिणात्य पाठ उत्तरकाण्ड सर्ग ३७ के बाद जो प्रक्षिप्त सर्ग
हैं उनमें सर्ग ५ श्लोक ४३)। रावण माता के समान ही सीता की लङ्का में रक्षा करता था--“लङ्कामानीय
यत्नेन मातेव परिरक्षिता ।” (वही सर्ग ५ श्लोक ५४)। वाल्मीकिरामायण गौडीय पाठ ६।४१।२५ तथा पश्चिमो-
त्तरीय पाठ ६।४२।२४ के अनुसार भी रावण राम के हाथों मर कर मुक्ति प्राप्त करना चाहता था—
“निहतो गन्तुमिच्छामि तद्विष्णोः परमं पदम् ।”
इसकी पुष्टि रामतापनीय उपनिषद् (४।१७) से होती है। वह परवर्ती नहीं, किन्तु वेद का अंश होने
से अनादि ही है। अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण में भी इसका समर्थन है। वस्तुस्थिति
यह है कि वाल्मीकिरामायण के द्वारा अधिकांश राम के लौकिक मानवीय रूप का वर्णन है जब कि रामतापनीय आदि
में उनके वास्तविक रूप का ही प्राधान्येन वर्णन है। शिवपुराण के अनुसार रावण ने पाताल में विष्णु से प्रार्थना
की थी कि तुम्हारे हाथ से मेरी मृत्यु हो—“त्वद्धस्ताद् भगवन् मृत्युर्ममास्तु ।” इन्हीं प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार
पर रामचरितमानस में रावण के अभिप्राय का वर्णन है—
“सुररञ्जन भञ्जन महिभारा। जौ भगवन्त लीन्ह अवतारा ॥
तौ मैं जाय बैरु हठि करिहूँ। प्रभु सर प्रान तजे भव तरिहूँ ॥
होइ भजन नहिं तामस देहा । मन क्रम बचन मन्त्र दृढ़ एहा ॥”
भृगुशाप, नारदशाप आदि अन्य कारण भी सीताहरण के हैं ही। बुल्के यह भी कहते हैं “धिक् त्वामद्य
विनश्यन्तीं यन्मामेवं विशङ्कसे ।” (वा० रा० ३।४५।३२) के अनुसार लक्ष्मण का शाप भी सीता हरण का कारण
है। भट्टिकाव्य के अनुसार शाप का रूप इस प्रकार है “शत्रुहस्तं गमिष्यसि” (५।६०) देवीभागवत तथा अध्यात्म-
रामायण में भी इस शाप का निर्देश है ।” परन्तु उनका कहना सङ्गत नहीं है, क्योंकि राम और सीता के प्रति लक्ष्मण
अनिष्ट की आशंका नहीं कर सकते थे। किसी के प्रति अनिष्ट की आकाङ्क्षा करना शाप होता है। किन्तु प्रकृत में
तो लक्ष्मण ने सीता की विपरीत मति के अनुसार शत्रुहस्त में पड़ने की सम्भावनामात्र व्यक्त की है न कि शाप
दिया है।
यह अवश्य है कि परोक्षरूप से महाभागवत लक्ष्मण का अपमान अवश्य सीता के उस दुःख का कारण
बना था, पर लक्ष्मण के शाप की कल्पना निरर्थक ही है। उसी शङ्का को व्यक्त करते हुए वे कहते हैं समग्र वन