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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 524

अध्याय बालकाण्ड ४४७
सिंहासनासीन होकर दिव्य लोक पधार गयीं । इन सबको प्रक्षेप कहना सचमुच पाश्चात्य-मनोवृत्ति का साहस ही है ।
बुल्के ने यह भी लिखा है कि ब्रज के प्रचलित लोकगीत के अनुसार सीता भाट की बेटी थी । शिकार खेलते समय
राम का उनसे परिचय हुआ । वस्तुतः आर्ष वाल्मीकिरामायण तथा अन्य पुराणादि आर्ष ग्रन्थ ही राम ओर सीता
के वृत्त में प्रमाण हो सकते हैं । तद्विरुद्ध कल्पनाएँ निराधार तथा निरर्गल ही हैं । आश्चर्य तो यह है कि एक ओर बुल्के
भाटों के लोकगीतों को प्रमाण मानते हैं और दूसरी ओर वाल्मीकि जैसे महर्षि की खिल्ली उड़ाने में नहीं सकुचाते ।
पउमचरियं के अनुसार जनक की पत्नी विदेहा से सीता अपने भ्राता भामण्डल के साथ उत्पन्न हुई थीं । जन्मते ही
भामण्डल को कोई देवता उठा ले जाकर किसी अन्य राजा के यहाँ छोड़ देता है । यह वृत्तान्त भी वाल्मीकिरामायण
के विरुद्ध होने से अनादरणीय ही है ।
कालिकापुराण (अ० ३८) के अनुसार नारद निःसन्तान जनक को यज्ञ करने का परामर्श देते हुए कहते
हैं कि यज्ञ के प्रभाव से दशरथ के चार पुत्र हुए हैं । तदनुसार जनक यज्ञ के लिए क्षेत्र तैयार करते समय एक पुत्री
और पुत्र पाते हैं । यह कथा भी किसी कल्प की हो सकती है, पर इसके अनुसार भी सीता अयोनिजा ही हैं ।
विष्णुपुराण में यज्ञभूमि से ही सीता के आविर्भाव का वर्णन है । पद्मपुराणीय उत्तरखण्ड के बङ्गीय पाठ के अनुसार
जनक को भूमि में पेटिकानिहित एक धनुष मिला था, जिसे खोलने पर जनक ने एक कन्या देखी । उसे सीता नाम
देकर ग्रहण किया । सीतोपनिषद् में भी हलाग्रजात होने के कारण सीता नाम का उल्लेख हुआ है । उसके अनुसार भी
सीता ही श्री, भू, नीला आदि दिव्य शक्तियों का दिव्य केन्द्र हैं । वीरलक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी
आदि सब उसी के अंश हैं । इसी दृष्टि से वह कृषि की अधिष्ठात्री देवी भी मानी जाती हैं । अतएव वैदिक सीता
ऐतिहासिक न होकर लाङ्गलपद्धति के मानवीकरण का परिणाम है, बुल्के का यह कथन सर्वथा निराधार है । क्योंकि
वैदिक साहित्य की व्याख्या ही रामायण, महाभारत आदि आर्ष इतिहासों एवं पुराणों में की गयी है । कृषि की
अधिष्ठात्री देवी जिसका अंश है, वह महालक्ष्मी ही ऐतिहासिक राजकुमारी सीता के रूप में प्रकट हुई थी । यही
भारतीय आस्तिकसमाज सम्मत वेद, रामायण, भारत तथा पुराणों का सारार्थ है । गौडीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठों
की मेनका सम्बन्धित जनक की मानसी पुत्री भी हलाग्रसमुद्भूत सीता में ही गतार्थ है ।
बुल्के का यह कथन भी असङ्गत है कि सीता की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कोई एक वृत्तान्त प्रामाणिक नहीं
माना जाता था, क्योंकि वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों में अयोनिजा सीता प्रामाणिक है ही ।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही असमियारामायण, कृत्तिवासरामायण तथा बलरामदासरामायण का भी अभिप्राय
लगाना उचित है । मेनका या उर्वशी को देखकर उसी के समान कन्या प्राप्त करने की इच्छा जनक जैसे ज्ञानी को
नहीं हो सकती है । ज्ञानी को कामवासना नहीं हो सकती है । जनक का तपोमय तेज भी परम्परा से भूमिजा सीता
में हेतु हुआ हो तब भी सीता अयोनिजा तो रही ही । वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड सर्ग १७ में वेदवती सीता के
रूप में उत्पन्न हुई ।
४१० वें अनुच्छेद में बुल्के कहते हैं कि “वेदवती की कथा में सीता के पूर्वजन्म का वर्णन किया गया है,
अतः उसकी उत्पत्ति के समय सीता के लक्ष्मी के अवतार होने का सिद्धान्त सर्वमान्य नहीं था !” उनका यह कथन भी
असङ्गत ही है, क्योंकि पूर्वजन्म की कथा-मात्र से अवतारत्व का विरोध नहीं होता, क्योंकि पुराणों में सीता का
जन्मान्तर में रुक्मिणी होना भी प्रसिद्ध ही है । राम का भी जन्मान्तर में कृष्ण होना प्रसिद्ध है ।
“राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि ।” (वि० पु०)
लक्ष्मी ही विष्णु के राघव होने पर सीता होती हैं एवं कृष्ण होने पर रुक्मिणी होती हैं । सभी जीव
सीताराम के ही अंश होते हैं । उपासना और तपस्या के बलपर उन्हें उनका सायुज्य भी प्राप्त होता है । वेदवती ने