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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 514

अध्याय बालकाण्ड ४३७
भी उन-उन देशों में प्रचलित कथानकों पर ही निर्भर है। रामकथा में वाल्मीकिरामायण की ही सर्वोत्कृष्ट प्रामाणि-
कता है, क्योंकि वह समाधिजा प्रज्ञा के आधार पर महर्षि द्वारा निर्मित वेदमूलक आर्ष ग्रन्थ है। व्यास आदि महर्षियों
की उक्तियाँ भी उससे समन्वित हैं। अन्य सब उक्तियाँ तदनुगुण होकर ही प्रमाण हैं।
राम-सीता-विवाह
३९० वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "प्रचलित वाल्मीकिरामायण में धनुर्भङ्ग के बाद चारों भाइयों के विवाह
का वर्णन है। महाभारत रामोपाख्यान में, जो रामायण के किसी प्राचीन रूप पर निर्भर है, न तो धनुर्भङ्ग है और
न राम को छोड़ अन्य भाइयों के विवाह का निर्देश किया गया है, अतः ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारम्भ में केवल राम
और सीता के विवाह का ही उल्लेख रहा होगा। धनुर्भङ्ग तथा अन्य भाइयों का विवाह बाद में जोड़ा गया होगा।
इस अनुमान की पुष्टि वाल्मीकिरामायण के अरण्यकाण्ड से होती है, जिसमें लक्ष्मण को अविवाहित कहा गया है।"
इन अंशों का सविस्तर खण्डन पीछे हो चुका है। वस्तुतः बुल्के की दृष्टि में अरण्यकाण्ड भी पूर्ण प्रामाणिक नहीं है।
उसमें भी अवतार-प्रसङ्ग उन्हें मान्य नहीं है। फिर, अटकलमात्र से धनुर्भङ्ग और चारों भाइयों के विवाह को प्रक्षिप्त
कैसे कहा जा सकता है ? महाभारत रामोपाख्यान में तो संक्षिप्त राम-कथा का ही वर्णन है। संक्षेप-कथन में बहुत से
अंश छूटते ही हैं। अरण्यकाण्ड में राम ने उपहास विनोद में ही कहा है—
"श्रीमानकृतदारश्च लक्षमणो नाम वीर्यवान् ।" (वा० रा० ३।१८।४)
टीकाकारों ने बालकाण्ड के विवाह का ध्यान रखते हुए अकृतदार का 'असंनिहितदारः' अर्थ किया है।
मीमांसा के उपक्रमन्याय से आरम्भ के अनुसार ही अन्त के वाक्यों का अर्थ लगाया जाता है। अतः बालकाण्ड में
लक्ष्मण का विवाह हो चुका है; तदनुसार 'अकृतदार' का अर्थ 'असंनिहितदार' ही है अर्थात् लक्ष्मण की पत्नी उनके
साथ नहीं है।
"स्रजश्च सर्वरत्नानि प्रिया याश्च वराङ्गनाः ।
ऐश्वर्यञ्च विशालायां ................................. ॥
पितरं मातरं चापि संमान्याभिप्रसाद्य च ।
अनुप्रव्रजितो रामं सुमित्रा येन सुप्रजा ॥" (वा० रा० ५।३८।५४-५६)
उक्त वचनों के आधार पर भी बुल्के लक्ष्मण के अविवाहित होने का समर्थन करते हैं, पर उक्त वचन
उनके विरुद्ध ही पड़ते हैं, क्योंकि त्याग तो विद्यमान का ही होता है। जैसे माता-पिता विद्यमान थे, अपूर्व सुख-
संपदाएँ प्राप्त थीं वैसे ही प्रिय वराङ्गनाएँ भी प्राप्त थीं। तभी उनका परित्याग कहा जा सकता है।
धनुर्भङ्ग वाल्मीकिरामायण प्रोक्त है, अतः अन्य रचनाओं में भी उसका महत्त्व होना स्वाभाविक ही है।
महावीरचरित के अनुसार विश्वामित्र के आश्रम में ही राम और लक्ष्मण सीता और उर्मिला को देखकर उनकी ओर
आकृष्ट होते हैं। उसी आश्रम में रावण एक दूत द्वारा सीता को माँगता है तथा राम द्वारा धनुर्भङ्ग किया जाता है।
अनर्घराघव में भी रावण की मांग का उल्लेख है। सत्योपाख्यान में बहुत से राजा परीक्षा में असफल होते हैं। इसमें
प्रहस्त आकर कहता है कि शिव के प्रति श्रद्धा रखने के कारण रावण धनुष-परीक्षा में सम्मिलित नहीं होते। स्वयंवर
के पश्चात् राम द्वारा धनुर्भङ्ग का वर्णन है (उत्तरार्ध सर्ग ३)। देवीभागवत में रावण सीता से कहता है कि शिवचाप
के भय से मैं स्वयंवर में नहीं आया। उपर्युक्त वृत्तान्तों तथा रघुवंश आदि अधिकांश रामकथाओं में वाल्मीकि के
अनुसार धनुर्भङ्ग के अवसर पर अन्य राजाओं की उपस्थिति का उल्लेख नहीं है तथा चारों भाइयों के विवाह का
उल्लेख है। वस्तुतः सत्योपाख्यान के अनुसार यहाँ भी समन्वय ही अभीष्ट है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार यहाँ भी
धनुर्भङ्ग की शर्त पर ही सीता का विवाह निश्चित है। तो यह मानना चाहिये कि राम के पूर्व अनेक राजा उस