रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ४२३
वामनावतार से जोड़ा जाता था। बाद में कृष्ण और राम की कथाओं में भी उनका उल्लेख मिलता है।" वे इसे
विकास समझते हैं, अर्थात् सत्य न मानकर उन्हें पीछे की कल्पना या प्रक्षिप्त मानते हैं। वे समझते हैं कि वामनावतार
की प्राचीनतम कथाओं में कश्यप और अदिति की चर्चा नहीं है। किन्तु महाभारत (आदि पर्व १।२७) में कश्यप तथा
विनता की तपस्या का वर्णन किया गया है, जिसके फलस्वरूप उनको अरुण तथा गरुड़ दो पुत्र प्राप्त हुए। महाभारत
के अन्य स्थलों में अदिति की आराधना ( ३।१३५।३) तथा तपस्या (१३।८३।२६,२७) का उल्लेख मिलता है,
जिससे वह विष्णु की माँ बन सकीं। हरिवंश (अध्याय ३।६७।६९) तथा मत्स्यपुराण (अध्याय २४३।९) में देवता,
कश्यप तथा अदिति सब मिलकर १००० वर्ष तक तपस्या करते हैं और अन्त में विष्णु से यह वरदान प्राप्त करते हैं
कि विष्णु वामन के रूप में अदिति से जन्म लेकर बलि को परास्त करें। वाल्मीकिरामायण (दाक्षिणात्य पाठ
१।२९।१०-१७) तथा वामनपुराण (अ० २४-२८) में कश्यप तथा अदिति की तपस्या एवं वरप्राप्ति का वर्णन
है। यदि वेद या ब्राह्मणों में वामन का नाम या कर्ममात्र श्रुत हैं, तो भी उनके कोई माता-पिता होंगे ही; फिर जब
वेदों के व्याख्यानभूत आर्ष पुराण वामन के माता और पिता का वर्णन करते हैं तो उन्हें ही वेदोक्त वामन की माता
क्यों न माना जाय । विशेषतः पूर्वोक्त १४१ अनुच्छेद का उत्तर पीछे दिया जा चुका है। कश्यप और अदिति वेदों के
अनुसार भी विशिष्ट दम्पति हैं। पुराणों के अनुसार देवता, दैत्य आदि सब उन्हीं की सन्तान हैं; अतः अरुण और
गरुड़ की प्राप्ति के लिए भी उनकी तपस्या सङ्गत है। दिति और अदिति के समान ही कद्रू और विनता भी उन्हीं
की पत्नियां थीं। उन कश्यप और अदिति का विष्णु या वामन की प्राप्ति के लिए भी तपस्या करना सङ्गत ही
है। अतः इन अंशो को विकास या प्रक्षिप्त कहना साहस ही है। महाभारत के शान्तिपर्व में विष्णु के विषय में
"अदित्यां सप्तधा विष्णुः पुराणे गर्भतां गतः ।" या "अदित्याः सप्तरात्रं तु पुराणे गर्भतां गतः ।"
(१२।४३।६) का उल्लेख तभी महत्त्वपूर्ण हो सकता है। यदि बुल्के उसका प्रामाण्य मानते हों। वे तो केवल विरोध
दिखाने के लिए ही विभिन्न ग्रन्थों के वचनों का उल्लेख करते हैं। श्लोक में सप्तधा पाठ अधिक संगत है। क्यों ?
पुराणों के साथ उसकी सङ्गति बैठ जाती है। अदिति के गर्भ से अनेकों बार विष्णु का वामन, राम, कृष्ण आदि
रूप में आविर्भाव हुआ है। मत्स्यपुराण (४७।९), ब्रह्माण्डपुराण ( २।७१।२०० और २३८), ब्रह्मवैवर्तपुराण
(कृष्णजन्मखण्ड अ० ७) आदि में कश्यप और अदिति को वसुदेव तथा देवकी से अभिन्न माना गया है। भागवत के
अनुसार सुतपा तथा पृश्नि ने स्वायम्भुव मन्वन्तर में १२००० वर्ष तक तपस्या कर भगवान् से वर प्राप्त किया था
कि वह तीन बार उनके पुत्र बने । फलतः विष्णु पृश्निगर्भ के रूप से सुतपा के पुत्र हुए, उपेन्द्र या वामनरूप से कश्यप-
पुत्र हुए तथा कृष्णरूप से वसुदेव के पुत्र हुए (भा० पु० १०।३।३२-४५)। अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस,
काश्मीरीरामायण आदि में कश्यप और अदिति का दशरथ और कौशल्या के रूप में भी आविर्भाव मान्य है। आदि-
पुराण में वर्णित एक स्वप्न के अनुसार नन्द पूर्वजन्म में दशरथ थे ( अ० १६) । कृत्तिवासरामायण के अनुसार
विष्णु कश्यप और अदिति की ओर निर्देश करते हुए देवताओं से कहते हैं कि दशरथ तथा कौशल्या ने मेरी सेवा की
है और मैं उनको वर दे चुका हूँ कि मैं तुम्हारे घर में जन्म लूँगा (बालकाण्ड अ० ३९)।
ब्रह्मा के पुत्र मनु की तपस्या का प्रथम उल्लेख (श० ब्रा० १।८।१।७) में है। प्रजा की कामना से
प्रेरित होकर वह आराधना तथा तपस्या में प्रवृत्त हुए, "प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत" (प्र० उ० १।४)
तथा विष्णुपुराण (१ अ० ७) में स्वायम्भुव की सृष्टि, उसकी तपश्चर्या, शतरूपा की प्राप्ति तथा इन दोनों की
सन्तति का वर्णन है ।
भागवत में स्वायम्भुव के विरक्त होने, राज्य छोड़ने और पत्नी के साथ वन में तपस्या करने की कथा
वर्णित है ( भा० पु० ८।१) । देवीभागवत के अनुसार स्वायम्भुव मनु ने १०० वर्ष तक तपस्या तथा देवी की