रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३३७
भाई रावण के पास जाती है। शेष कथा वाल्मीकिरामायण के अनुसार है। वाली के मित्र सम्बूरान की कथा हिन्द-
चीन तथा श्याम में भी मिलती हैं।
(६) युद्ध—यह प्रायः वाल्मीकिरामायण की कथा के अनुसार है। भस्मलोचन तथा महिरावण की
कथा यहाँ भी है। इन्द्रजित् की पत्नी के सती होने का तथा रावण के मर्म स्थान (दाहने कान के पीछे उसका एक
छोटा ११वां सिर) का भी उल्लेख है। युद्ध के बाद आहत रावण का शरीर सेरन्दीब पर्वत के तल में पड़ा रहता है
और सारी सेना उसको देखने जाती है। विभीषण (जो राम के मन्त्री बन जाते हैं) राम की बहन कीकवी देवी से
विवाह करते हैं। एक और विशेषता यह है कि कुम्भकर्ण-वध के बाद तथा इन्द्रजित्-वध के बाद भी युद्ध चालीस
चालीस दिनों के लिए स्थगित किया जाता है।
(७) सीता-त्याग और राम-सीता सम्मिलन—इस अन्तिम भाग में रावण के चित्र के कारण
सीता-त्याग का वर्णन है। अनन्तर लव के जन्म तथा महर्षि कलि द्वारा कुश की सृष्टि की कथा दी गयी है। कुश-लव
के लक्ष्मण से युद्ध के बाद राम-सीता सम्मिलन वर्णित है। अन्त में कुश और लव तथा वानर-सेना के अनेक
सेनापतियों का राक्षसियों से विवाह करने का उल्लेख किया गया है।
बुल्के कहते हैं: हिन्देशिया की प्राचीन रामकथा के आधार भट्टिकाव्य, महानाटक तथा अभिषेकनाटक स्पष्ट
हैं, किन्तु सेरीराम का मूल स्रोत निर्धारित करना असम्भव प्रतीत होता है। फिर भी इतना स्पष्ट है कि वाल्मीकि-
रामायण से भिन्न जो बहुसंख्यक प्रसङ्ग मिलते हैं उनका आधार भारतीय ही है। प्रमाणस्वरूप में उन्होंने रामकथा
(अपनी पुस्तक) के अनेक अनुच्छेदों का उल्लेख किया है जिनमें जैनी, बंगाली, उड़िया, रङ्गनाथरामायण,
कम्बरामायण, आनन्दरामायण, कथासरित्सागर, मैरावणचरित, तोरवेरामायण,मुसलमानी धर्म की चर्चा की है।
वस्तुतः जैसे भारतीय भी अनेक राम-कथाग्रन्थों के कई अंश मौलिक या स्वतन्त्र कल्पना हैं वैसे ही मौलिकता के नाम
पर स्वतन्त्र कल्पना यहाँ भी हो ही सकती है।
पातानी रामकथा
पातानी रामकथा में सेरीराम के अनेक पात्रों का महासिकु नामक तपस्वी में एकीकरण हुआ है। प्रारम्भ
में उनकी पत्नी की चार सन्तानों का वर्णन है। एक पुत्री, वाली, सुग्रीव और बिलों। दूसरे भाग में महासिकु की
दत्तक पुत्री मंदुदकी की कथा मिलती है। सीता के त्यक्त किये जाने पर महासिकु उसे पुत्रीस्वरूप ग्रहण करते हैं।
उनका एक और सेरावी नामक (राम) दत्तक पुत्र है जिसको महासिकु सीता पर अनुरक्त होने के कारण घर से
निकाल देते हैं। अनन्तर सीता स्वयंवर का वर्णन दिया गया है जिसमें रावण भी आया था। शेष कथानक सेरीराम
के अनुसार है। लेकिन इसमें केवल रावण-वध तक की कथा मिलती है।
वस्तुतः- विप्रकृष्ट देश-काल की घटनाओं में प्रत्यक्षादि प्रमाणों पर आधारित इतिहास या आर्षज्ञान
(ऋतम्भरा प्रज्ञा) को छोड़कर और कोई भी प्रमाण नहीं होता है, कल्पना तो कल्पना ही है। उसके आधार पर
तथ्य-निर्णय असम्भव ही है। वाल्मीकिरामायण तथा अन्यान्य रामायण, महाभारत, पुराण तथा आर्ष संहिताएं ही
रामचरित में प्रमाण हैं। इन्हीं के आधार पर दूर-दूर देशों में रामकथा फैली थी। उनमें उत्तरोत्तर कल्पनाएं और
किवदन्तियां जुड़ती गयीं। मूल की विकृति में अधिक विकारों की सम्भावना रहती है, इसलिए राम के वास्तविक
आदर्शों का दर्शन इनमें दुर्लभ होता है।
जावा का सेरतकाण्ड
३२२ अनु० : सेरतकाण्ड की रामकथा सेरीराम से बहुत भिन्न नहीं है। इसकी विशेषता निम्नोक्त है।
इसमें विस्तृत भूमिका के साथ नबी अदम की कथा के बाद जावा के प्राचीन राजाओं की वंशावली तथा उसी में
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