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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 40

( ३५ )
सीता ने राम को परम धार्मिक, सत्यप्रतिज्ञ और पिता की आज्ञा का पालन करनेवाले दृढ़व्रती कहा है ।
वह कहती हैं आप में धर्म और सत्य सब कुछ पुण्यताहेतु प्रतिष्ठित है । वाल्मीकिजी के द्वारा नारदजी से पूछे गये
राम के गुणों में उन्हें धर्मज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ कहा गया है ।
राम के अपार चरित
रामचरित का प्राचुर्य और उसकी पापराशिविनाशिता प्रसिद्ध है । इसी से कहा गया है—
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥
रामचरित शतकोटि ( एक अरब ) श्लोकों में विस्तृत है, अर्थात् अपार है और उसके एक एक अक्षर में
महापातकों के विनाश की क्षमता है । महाभारत, अष्टादशपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, देवीपुराण, भागवत, उपपुराण
आदि की भी विशिष्ट फलश्रुतियाँ हैं किन्तु उनमें विष्णुचरित, शिवचरित, देवीचरित, गणेशचरित, सूर्यचरित का उत्कर्ष
भी सोदाहरण दर्शाया गया है ।
रामचरित के प्रत्येक अक्षर में महापातकों को विनष्ट करने की अतुलशक्ति निहित है । रामनाम जितना
जन-जन प्रख्यात है, उतना और कोई भी विष्णु, कृष्ण, वैकुण्ठ, माधव आदि देवताओं का नाम प्रख्यात न हो सका ।
पद्मपुराण के अनुसार शिवजी ने पार्वतीजी को बतलाया कि राम ही मेरा धन है। एक बार रामनाम का जप
विष्णु के हजार नामों के जप के बराबर होता है । हे मनोरमे ! मैं उसी राम में रमण करता हूँ । हे वरानने !
मैं अतिराम अर्थात् परशुराम का अतिक्रमण करनेवाले राम में अतिरमण करता हूँ ।
राम रामेऽतिरामेऽतिरमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥
“राम अनंत अनंतगुन अनंत कथा विस्तार” के अनुसार श्रीरामजी के अनन्त गुण हैं, उनका पार पाना
संभव नहीं ।
कालिदास ने कहा है—
महिमानं यदुत्कीर्यं तव संह्रियते वचः ।
श्रमेण तदशक्त्या वा न गुणानामियत्तया ॥
भगवन्, आपकी थोड़ी बहुत महिमा गाकर जो हम मौनावलम्बन करते हैं, उसका अर्थ यह नहीं है कि
आपकी महिमा की इतिश्री हो गयी । उसका कारण हमारी थकावट अथवा अशक्ति है, गुणों की इयत्ता से हमारा
मौनावलम्बन नहीं ।
पुष्पदन्ताचार्य कहते हैं—
असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥
भगवन् ! आपकी महिमा का लेखन यदि काले पहाड़ के समान मषी-स्याही हो और सिन्धुरूपी मषीपात्र
में घोली जाय तथा कल्पवृक्ष की टहनी की कलम हो और सारी पृथिवी पत्र ( लेखाधार कागज का ताव ) हो एवं
स्वयं शारदा ही सर्वदा रातदिन कल्पवृक्ष की शाखा लेकर आपके गुणों को लिखे तो भी आपके गुणों का, आपकी
महिमा का पार नहीं पा सकती ।