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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 381

३०४ रामायणमीमांसा नवम
काल-निर्णय रामायण
१७९ वें अनु० में बुल्के ने काल-निर्णय रामायण की चर्चा की है जिसमें राम-कथा को प्रधान घटनाओं
की तिथियों का उल्लेख है । परन्तु यह तो सर्वथा प्राचीन ही है । वाल्मीकिरामायण के टीकाकार नागेश भट्ट आदि
इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर रामकथा की घटनाओं का काल-निर्धारण करते हैं । स्कन्दपुराण के ब्रह्मखण्ड में धर्मारण्य-
खण्ड के तीसवें अध्याय तथा पद्मपुराण में पातालखण्ड के ३६ वें अध्याय में यह सब वर्णन है । पद्मपुराण में महर्षि
लोमश वक्ता हैं ।
अग्निवेश के नाम से भी एक अन्य रामायण प्रचलित है । वे भी ऋषि हैं । वह रामायण भी, जो कि
वेंकटेश प्रेस के अनुसार १०५ श्लोकों का है, प्रामाणिक है । समयादर्शरामायण लक्ष्मीनारायण प्रेस से प्रकाशित १०३
श्लोकों का है । समयनिरूपणरामायण वेंकटेश प्रेस से प्रकाशित ४५ श्लोकों का है । अग्निवेशकृत रामायण का
राजेन्द्रलाल मिश्र के कैटलाग में ( भाग ७ पृष्ठ ५८ ) तथा रामायणरहस्य या रामहृदयम् का (भाग ८ पृष्ठ १२५)
उल्लेख है । इस रचना का विस्तार २७७ श्लोकों में बताया गया है । तँजोर कैटलाग में अग्निवेश कृत ५०० श्लोकों
के विस्तारवाले रामजातकम् का उल्लेख है । अग्निवेशरामायण में विवाह के समय राम और सीता की अवस्था
क्रमशः १५ तथा ६ वर्ष की थी, वनवास के समय २७ और १८ वर्ष की थी एवं राज्याभिषेक के समय ४२ और
३३ वर्ष की थी ।
इसी तरह अम्बररामायण (दे० कल्याण का रामायणाङ्क पृ० ३०४ ), व्यासकृत रामायणतात्पर्यदीपिका
( मद्रास कैटलाग, नं० आर १५१८ ), रामावतारकालनिर्णय-सूचिका (मद्रास कैटलाग, नं० टी १९०९), श्रीनिवास-
राघवकृत रामायणसंग्रह ( मद्रास कैटलाग नं० आर० २२३४ ) में भी उपर्युक्त विषयों का वर्णन है ।
१८० वें अनु० में बुल्के ने अर्वाचीन रामकथा-साहित्य में बहुसंख्यक रामायणों का उल्लेख किया है ।
आनन्दरामायण के अनुसार वाल्मीकिरामायण से ही अनेक रामायणों का प्रादुर्भाव हुआ है । बुल्के कहते हैं उनमें
अधिकांश कल्पित हैं । पर साथ ही वे यह भी कहते हैं कि यदि उनकी रचना हुई भी हो तो इसमें बहुत सन्देह नहीं
है कि ये ग्रन्थ अपेक्षाकृत अर्वाचीन हैं । परन्तु उनका यह कथन भी अर्ध सत्य ही है, क्योंकि उनमें से बहुत रामायण
प्राचीन ही हैं ।
भुशुण्डिरामायण या मूलरामायण तथा आदिरामायण का उल्लेख अधिक होता है । कहा जाता है कि
इसकी हस्तलिपि श्रवणकुञ्ज अयोध्या में तथा लक्ष्मणकिला में सुरक्षित है । उसमें पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर चार
खण्ड है । बुल्के के अनुसार वे स्वयं तो मूल प्रति नहीं देख सके, परन्तु डाक्टर भगवतीप्रसादसिंह को इसकी पूरी
प्रति मिली है । बड़ौदा ओरिएण्टल इंस्टिट्यूट में उसके दक्षिण, पश्चिम और उत्तर खण्डों की अर्वाचीन हस्तलिपियाँ
विद्यमान हैं । जयपुर में दो रामायण हैं, जिनके वक्ता भुशुण्डि हैं, एक आदिरामायण और दूसरा ब्रह्मरामायण ।
इनमें रामजी की रास-लीलाओं का वर्णन है । इण्डिया आफिस के चित्रकूटमाहात्म्य की हस्तलिपि में रचना अथवा
लिपिकाल का उल्लेख नहीं है । पर यह मेकेंजी महोदय के संग्रह की है । अतः कम से कम डेढ़ सौ वर्ष पुरानी है ।
परन्तु इतनेमात्र से भुशुण्डिरामायण आदि की अर्वाचीनता और अनार्षता सिद्ध नहीं होती है । प्राचीनकाल में ग्रन्थ
लिपि सुरक्षित रखने की पद्धति बहुत कम प्रचलित थी, अतः प्राचीन से प्राचीन ग्रन्थों की भी सुरक्षित हस्तलिपि का
मिलना असम्भव है । इसमें भरत-अत्रि-संवाद भुशुण्डि द्वारा शाण्डिल्य को सुनाया गया है । श्रोता और वक्ता के अति
प्राचीन होने के कारण मूल कथा की प्राचीनता स्पष्ट ही सिद्ध है । उसके अनुसार चित्रकूट के सान्तानिक वन में एक
सरोवर है । उसके मध्य में एक रम्य मण्डप है । जहाँ एक वेदिका पर सीता एवं उनकी सखियों के साथ राम रास-
लीला करते हैं । डा० भगवतीप्रसाद अपने "रामभक्ति में रसिक सम्प्रदाय" में भुशुण्डिरामायण के कथानक के विषय