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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 377

३०० रामायणमीमांसा नवम
अवस्था ( यौवन ), रूप ( सौन्दर्य ), विभूति ( धनसम्पत्ति ) इनमें से एक एक भी गर्व का कारण होता
है । अतिथि में ये सभी वस्तुएं थीं, परन्तु उनका मन गर्वीला नहीं हुआ ।
“तपो रक्षन् स विघ्नेभ्यस्तस्करेभ्यश्च सम्पदः ।
यथास्वमाश्रमैश्चक्रे वर्णैरपि षडंशभाक् ॥” ( रघुवं० १७।६५ )
विघ्नों से तपस्वियों के तप की तथा चोरों से प्रजाओं की सम्पत्ति की रक्षा करने के कारण उस
महाराज अतिथि को ब्राह्मणादि वर्णों, ब्रह्मचारी आदि आश्रमियों ने अपने-अपने तप और सम्पत्ति के छठे
हिस्से का भागी बना दिया ।
“खनिभिः सुषुवे रत्नं क्षेत्रैः सस्यं वनैर्गजान् ।
दिदेश वेतनं तस्मै रक्षासदृशमेव भूः ॥” ( रघुवं० ७१।६६ )
रक्षा के अनुरूप ही पृथ्वी ने खानों से रत्न, खेतों से अन्न और वनों से हाथियों का उत्पादन कर उस
राजा अतिथि के लिए वेतन दिया ।
“स गुणानां बलानाञ्च षण्णां षण्मुखविक्रमः ।
बभूव विनियोगज्ञः साधनीयेषु वस्तुषु ॥” ( रघुवं० १७।६७ )
कार्तिकेय के समान पराक्रमी वह राजा अतिथि सन्धि, विग्रह आदि छह गुणों एवं मूल भृत्यादि बलों
का प्रयोजन के अनुसार विनियोजन का यथार्थ ज्ञाता था ।
“कूटयुद्धविधिज्ञेऽपि तस्मिन् सन्मार्गयोधिनि ।
भेजेऽभिसारिकावृत्ति जयश्रीर्वीरगामिनी ॥” ( रघुवं० १७।६९ )
वह राजा अतिथि कूटयुद्ध का विशेषज्ञ होता हुआ भी अपनी वीरता के कारण सरल धार्मिक युद्ध ही
करता था । विजयश्री अभिसारिका के समान उसका स्वयं वरण करती थी, कारण वह वीर पुरुष के ही पास
पहुँचती है ।
“प्रवृद्धो हीयते चन्द्रः समुद्रोऽपि तथाविधः ।
स तु तत्समवृद्धिश्च न चाभूत्ताविव क्षयी ॥” ( रघुवं १७।७१ )
चन्द्रमा बढ़कर क्षीण होता है और उसी तरह समुद्र भी बढ़कर क्षीण होता है । राजा अतिथि उनके
समान बढ़ा अवश्य पर उनके समान क्षीण नहीं हुआ ।
“स्तूयमानः स जिह्लाय स्तुत्यमेव समाचरन् ।
तथापि ववृधे तस्य तत्कारिद्वेषिणो यशः ॥” ( रघुवं० १७।७३ )
प्रशंसनीय कार्य करने पर भी यदि कोई अतिथि राजा की प्रशंसा करता था तो वह अपनी प्रशंसा सुन
कर लज्जित ही होता था । प्रशंसकों का द्वेषी होने पर भी उसका यश बराबर बढ़ता ही गया ।
“इन्दोरगतयः पद्मे सूर्यस्य कुमुदेऽशवः ।
गुणास्तस्य विपक्षेऽपि गुणिनो लेभिरेऽन्तरम् ॥” ( रघुवं० १७।७५ )
कमल में चन्द्रमा की और कुमुद में सूर्य की किरणे प्रवेश नहीं पा सकती । परन्तु गुणवान् महाराज
अतिथि के गुण शत्रुओं के यहाँ भी स्थान पाते थे । अर्थात् शत्रु भी उनके गुणों की प्रशंसा करते थे ।
“पराभिसन्धानपरं यद्यप्यस्य विचेष्टितम् ।
जिगीषोरश्वमेधाय धर्म्यमेव बभूव तत् ॥” ( रघुवं० १७।७६ )