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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 313

से सुना है वैसे और भी उनके जो रहस्य और प्रकाशमय चरित्र हैं, जो अभीतक अविदित हैं वे भी तुम्हें विदित
होंगे, इस काव्य में तुम्हारी कोई भी वाणी अनृत नहीं होगी—
“रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम ।
धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः ॥
वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् ।
रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥
रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः ।
वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ॥
तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति ।
न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ॥
कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् ।” (वा० रा० १।२।३२-३५½)
पुनः तीसरे सर्ग में स्पष्टतः कहा गया है—
“उपस्पृश्योदकं सम्यङ्मुनिः स्थित्वा कृताञ्जलिः ।
प्राचीनाग्रेषु दर्भेषु धर्मेणान्वेषते गतिम् ॥
रामलक्ष्मणसीताभी राज्ञा दशरथेन च ।
सभार्येण सराष्ट्रेण यत् प्राप्तं तत्र तत्त्वतः ॥
हसितं भाषितं चैव गतिर्यावच्च चेष्टितम् ।
तत् सर्वं धर्मवीर्येण यथावत् सम्प्रपश्यति ॥
स्त्रीतृतीयेन च तथा यत् प्राप्तं चरता वने ।
सत्यसन्धेन रामेण तत् सर्वं चान्ववैक्षत ॥
ततः पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वं योगमास्थितः ।
पुरा यत् तत्र निर्वृत्तं पाणावामलकं यथा ॥
तत् सर्वं तत्त्वतो दृष्ट्वा धर्मेण स महामतिः ।
अभिरामस्य रामस्य तत् सर्वं कर्तुमुद्यतः ॥” (वा० रा० १।३।२-७)
महर्षि ने आचमन कर प्राचीनाग्र कुशों पर आसीन होकर योगज धर्म से राम आदि के चरित्रों को ध्यान
से देखा । राम, लक्ष्मण, सीता तथा सराष्ट्र एवं तीनों भार्याओं सहित दशरथ ने जो कुछ भी हसित, भाषित, चेष्टित,
गमन आदि किया धर्मबल से ऋषि ने सब कुछ देखा । योग का आश्रयण करके पुराकाल में जो कुछ भी घटनाएँ
घटी उनको करतल में स्थित आँवले की तरह सम्पूर्णतः ओर सम्यगरूप से महर्षि ने देख लिया । उन महर्षि के
आश्रम में ही सीता के दो पुत्र हुए । उत्तरकाण्ड के ६०वें सर्ग में उल्लेख है कि जिस रात में मथुरा जाते हुए शत्रुघ्न
वाल्मीकि महर्षि के आश्रम में जाकर रुके थे उसी रात में सीता ने दो बालकों को जन्म दिया । मुनिबालकों से
समाचार पाकर मुनि ने वहाँ जाकर बालकों की राक्षसादि-विनाशिनी रक्षा की व्यवस्था की । कुश से ऋषि ने
जिस बालक की रक्षा की व्यवस्था की उसका नाम कुश हुआ और लव से जिसका मार्जन किया उसका नाम
लव हुआ ।
नागेश के अनुसार छिन्न कुशों का अग्रभाग कुश कहा जाता है एवं अधोभाग लव कहा जाता है । इसी
तरह वाल्मीकि मुनि के आश्रम में ही पालित, पोषित एवं संस्कृत होकर उन दोनों बालकों कुश और लव ने मुनिवेष

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