रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ रामायणमीमांसा सप्तम
(इ) प्राकृत साहित्य की मुख्य विशेषता है—शृङ्गार और अद्भुत रस बाहुल्य (दे० कथासरित्सागर) ।
इसके अतिरिक्त पाली तथा प्राकृत की शैली बहुत अपरिष्कृत है। अतः प्राकृत साहित्य उपर्युक्त
कारणों से संस्कृत-काव्य का आधार तथा आदर्श होने के नितान्त अनुपयुक्त सिद्ध होता है।
वस्तुतः कथासरित्सागर भी कोई नवीन रचना नहीं है। शिवजी ने ही इतिहासपुराणों की अधिकांश
कथाओं का वर्णन किया है। शिव-पार्वती के संवाद का ही पिशाचभाषा में बृहत्कथा के रूप में उल्लेख हुआ है।
कथासरित्सागर उसी पर आधारित है। शृङ्गार और अद्भुत रस पुराणों में कम नहीं है। वेदों में उक्त दोनों बातें
हैं ही। ई० पू० दूसरी, तीसरी शताब्दी में रामायण का निर्माण मान लेने पर भी आर्ष प्रयोगों का समर्थन नहीं हो
सकता, क्योंकि “लक्ष्यैकचक्षुष्क ऋषि” ही आर्ष प्रयोग करता है। लक्षणैकचक्षुष्क कोई कवि आर्ष प्रयोग करने का
अधिकारी नहीं होता। समस्त शब्दों की शुद्धि और अशुद्धि जो पाणिनि आदि के समान आर्ष ज्ञान से जान सकता
है वही ऋषि पाणिनि आदि के लक्षणों, सूत्रों से असिद्ध परन्तु अपने आर्ष-विज्ञान से सिद्ध शब्दों का प्रयोग कर
सकता है। जो लोग समझते हैं प्राकृत का ही संस्कार कर संस्कृत निष्पन्न होता है उनका यह भ्रम है, क्योंकि वह
प्राकृत-व्याकरण के विरुद्ध है। प्राकृत व्याकरण में कहा गया है—
“प्रकृतिः संस्कृतं तस्माद्भवं प्राकृतम्।”
संस्कृत ही प्रकृति है, उससे उद्भूत भाषा ही प्राकृत भाषा है। अतएव वेद के मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक,
उपनिषद् आदि की भाषा प्राकृत भाषा से बहुत प्राचीन है और वह संस्कृत ही है। यद्यपि संस्कृत शब्दों के साथ ही
अपभ्रंश शब्द भी होते हैं; जैसे चलनी के द्वारा ग्राह्याग्राह्य पदार्थों से ग्राह्य वस्तु का पृथक्करण किया जाता है
वैसे ही संस्कृत शब्दों को अपभ्रंश शब्दों से पृथक् कर देना ही शब्दों का संस्कार है। अतएव राम के समकाल में
वेदार्थ उपबृंहण की दृष्टि से ही संस्कृत भाषा में ही महर्षि वाल्मीकि ने रामायण का निर्माण किया।
१३६ वें अनु० के अनुसार बुल्के कहते हैं, “आठवें अध्याय में बालकाण्ड को प्रक्षिप्त सिद्ध किया गया है।
डा० याकोबी के अनुसार आदिरामायण का प्रारम्भ बालकाण्ड के निम्नलिखित श्लोकों में सुरक्षित है—
सर्ग ५ श्लोक १-४ रामायण की स्तुति ।
सर्ग ५, श्लोक ५-६ कोशल तथा अयोध्या की स्तुति ।
सर्ग ५, श्लोक ९ } दशरथ की स्तुति ।
सर्ग ६, श्लोक २-४
सर्ग १८, श्लोक १६-२१ (उत्तरार्द्ध) २२; दशरथ के पुत्रों का उल्लेख ।
सर्ग १८, श्लोक २५ पुत्रों की स्तुति (अथवा अयोध्याकाण्ड १, १)।
सर्ग १८, श्लोक २४-१२; राम की श्रेष्ठता (अथवा अयोध्याकाण्ड १,६-८।
इस भूमिका के बाद काव्य की मुख्य वस्तु का प्रारम्भ हुआ होगा। (दे० अयोध्याकाण्ड सर्ग २,
श्लोक ३६ )”
उपर्युक्त कल्पना के किसी आधार का बुल्के उल्लेख नहीं करते। वस्तुतः उपलब्ध सम्पूर्ण बालकाण्ड
प्रामाणिक रामायण है और उसके बिना रामायण अधूरा ही रहेगा। अयोध्या तथा दशरथ का वर्णन तथा उनका
अश्वमेध तथा पुत्रेष्टियज्ञ, पुत्र-जन्म, उनका संस्कार, विश्वामित्र का आगमन, राम-लक्ष्मण का उपनयन, सिद्धाश्रम-
गमन, मिथिलागमन, विवाह आदि के बिना अयोध्याकाण्ड का अकस्मात् आरम्भ होना सर्वथा असङ्गत ही है। इसके
अतिरिक्त बालकाण्ड को ही प्रक्षिप्त मान लेने पर उपर्युक्त तालिका के कुछ श्लोकों को ही किस आधार पर प्रामाणिक
कहा जा सकता है ? निश्चय ही किसी पुष्ट प्रमाण के समर्थन के अभाव में ऐसे कथन अमान्य ही हैं।