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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 299

२२२ रामायणमीमांसा षष्ठ
'कहा नहीं, तुमको नहीं खाऊँगा। तुम्हारे उदर की अग्नि को उद्दीप्त करूँगा जो तुम्हारे लिए बहुविध अन्नभक्षण के
लिए उपयोगी होगा। यह कह कर वृत्र इन्द्र में प्रविष्ट हो गया । यह सब इन्द्र के हवि का त्रिधा विभाग और इन्द्र-
विष्णुमिलित देवतत्व की प्रशंसा है ।
तस्मादिन्द्रोऽबिभेदपि त्वष्टा तस्मै वज्रमसिञ्चत्तपो वै स वज्र आसीत्तमुद्यन्तुं नाशक्नोदथ वै
तर्हि विष्णुः (२) अन्या देवतासीत् सोऽब्रवीद्विष्णवे होदमाहरिष्यावो येनायमिदमिति स विष्णुस्त्रेधात्मानं
वि न्यधत्त । पृथिव्यां तृतीयमन्तरिक्षे तृतीयं दिवि तृतीयम् अभिपर्या वर्त्ताद्वयबिभेद यत् पृथिव्यां
तृतीयमासीत्तेनेन्द्रो वज्रमुदयच्छत् विष्ण्वनुस्थितः सोऽब्रवीन्मा मे प्रहरास्ति वा इदम् (३) मयि वीर्यं
तत्ते प्रदास्यामीति तदस्मै प्रायच्छत् तत्प्रत्यगृह्णादधा मेति तद्विष्णवेऽतिप्रायच्छत् तद् विष्णुः प्रत्यगृह्णाद-
स्मास्विन्द्र इन्द्रियं दधात्विति ।
इस प्रघट्टक से स्पष्ट है कि विष्णु की सहायता से ही इन्द्र वज्र उठाने में समर्थ हुए; विष्णु ने ही वृत्रदत्त
वीर्य (शक्ति) को भी धारण किया । अतः इन्द्र की अपेक्षा विष्णु की विशेष महत्ता स्वयं सिद्ध हो जाती है। वैदिक
साहित्य में कहीं भी इन्द्र की अपेक्षा विष्णु को अपकृष्ट या विष्णु की अपेक्षा इन्द्र को उत्कृष्ट नहीं कहा गया है। वेद
के अनेक मन्त्रों में विष्णु के स्वरूप को ही परमपद और सूरिवेद्य कहा गया है—
“तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ।” (ऋ० सं० १।२२।२०)
सूरयः विद्वांस ऋत्विगादयः । विष्णोः । परमम् उत्कृष्टम् । तत्तत् शास्त्रप्रसिद्धम् । पदं स्वर्ग-
स्थानम् । शास्त्रदृष्ट्या सदा । पश्यन्ति । दिवीव आकाशे यथा । आततं सर्वतः प्रसृतम् । चक्षुः । तद् यथा
निरोधाभावेन विशदं पश्यति तद्वत् ।
विद्वान् लोग विष्णु के उत्कृष्ट शास्त्रप्रसिद्ध पद (स्वरूप) को शास्त्रदृष्टि से इस तरह सदा देखते हैं जैसे
निरोध न रहने के कारण आकाश में सर्वतः प्रसृत चाक्षुष तेज विशदरूप से देखता है ।
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् (ऋ० सं० १।२२।२१) ।
विष्णोः । यत् । परमं । पदं पूर्वोक्तमस्ति । तत् पदम् । विप्रासो मेधाविनः समन्धिते सम्यक्
दीपयन्ति । कीदृशाः, विपन्यवः विशेषेण स्तुतिकर्तारः । विष्णु के पद को मेधावी लोग सम्यक् प्रकाशित करते हैं
जो शब्द और अर्थ के सम्बन्ध में प्रमादरहित रहकर जागरूक रहते हैं ।
जागृवांसः शब्दार्थयोः प्रमादराहित्येन जागरूकाः ।
उपर्युक्त वचनों से विष्णु की परमेश्वरता प्रसिद्ध है ।
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