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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 295

२१८ रामायणमीमांसा षष्ठ
“सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्,
सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ।”
भेद न होने पर भी मैं आपका हूँ आप मेरे नहीं, क्योंकि समुद्र का तरङ्ग है यही व्यवहार होता है,
तरङ्ग का समुद्र यह व्यवहार नहीं होता । “सागरः सागरोपमः” इत्यादि स्थलों में अभेद में भी तुलना की गयी है ।
१२८ वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “राम की तुलना विष्णु से १८ बार की जाती है, इन्द्र से ७७ बार ।
कई स्थानों पर राम तथा लक्ष्मण की तुलना क्रमशः इन्द्र तथा विष्णु से की गयी है जिससे स्पष्ट है कि विष्णु की
अपेक्षा इन्द्र श्रेष्ठ माने जाते हैं ( वा० रा० ६।१९।१२; ६।३३।२८; ३।६८।२८ ) ।
एक उदाहरण पर्याप्त होगा—
“ततो राममभिक्रम्य सौमित्रिरभिवाद्य च ।
तस्थौ भ्रातृसमीपस्थः शक्रस्येन्द्रानुजो यथा ॥” ( वा० रा० ६।४१।४ )
अर्थात्—लक्ष्मण भ्राता राम के समीप आकर अभिवादन कर वैसे ही समीप में बैठ गये जैसे इन्द्र के
समीप उपेन्द्र बैठते हैं ।
इस उद्धरण में वैदिक साहित्य के अनुसार विष्णु इन्द्र के अनुज माने जाते हैं । वैदिक साहित्य के अनुसार
भी प्रामाणिक 'आदिरामायण' में इन्द्र सर्वश्रेष्ठ देवता थे । राम की विजय इन्द्र की सहायता से होती है। यह भी
इन्द्र की श्रेष्ठता को सूचित करता है ।”
बुल्के का उक्त कथन भी अकिञ्चित्कर है, क्योंकि 'आदिरामायण' नामक कोई ग्रन्थ प्रसिद्ध नहीं है ।
बुल्के एवं अन्य पाश्चात्य विद्वानों द्वारा रामायण एवं महाभारत के सम्बन्ध में ऐसी विविध दुष्कल्पनाएँ की गयी हैं
जिनका उद्देश्य प्रसिद्ध रामायण एवं महाभारत में शङ्का उत्पन्न करना है । अपने अनुकूल अर्थवाले कतिपय श्लोकों
को आदिरामायणस्थ बताते हुए प्रामाणिक मान लेना प्रतिकूल अर्थ के द्योतक अन्य श्लोकों को प्रक्षेप कह कर
अप्रामाणिक कह देना असङ्गत है । विशेषतः जब कि 'आदिरामायण' नामक कोई भी प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध
नहीं है ।
विष्णु की अपेक्षा इन्द्र की श्रेष्ठता की बात भी निराधार है । लक्ष्मण को इन्द्रानुज की उपमा देने मात्र
से यह नहीं सिद्ध होता; वस्तुतः वामनावतारधारी विष्णु ही इन्द्र के अनुज हैं । मूलविष्णु नहीं; जैसे रामादि अन्य
अवतार हुए हैं वैसे ही उपेन्द्र या वामनावतार भी हुआ है । यह वामन ही इन्द्र के अनुज हैं । यह कथा पुराणों के
अतिरिक्त वाल्मीकिरामायण में भी वर्णित है । कश्यप ने कठिन तपस्या कर विष्णु से वरदान माँगा है कि आप मेरी
पत्नी अदिति के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट होकर इन्द्र के छोटे भाई बनकर शोकार्त देवों की सहायता करें—
“वरं वरद सुप्रीतो दातुमर्हसि सुव्रत ।
पुत्रत्वं गच्छ भगवन्नदित्या मम चानघ ॥
भ्राता भव यवीयांस्त्वं शक्रस्यासुरसूदनः ।
शोकार्तानां तु देवानां साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥” ( वा० रा० १।२९।१६, १७ )
तदनन्तर विष्णु अदिति में वामनरूप से उत्पन्न हुए और बलि के पास गये—
“अथ विष्णुर्महातेजाः अदित्यां समजायत ।
वामनं रूपमास्थाय वैरोचनिमुपागमत् ॥” ( वा० रा० १।२९।१९ )