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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 283

२०६ रामायणमीमांसा षष्ठ
होने का उल्लेख है। ब्रह्मा आदि देवता प्रकट होकर राम की विष्णुरूप में स्तुति करते हैं तथा सीता को लक्ष्मी से
अभिन्न मानते हैं (वा० रा० ६।११९।२७) ।
यह वाल्मीकिरामायण का एकमात्र स्थल है जहाँ सीता तथा लक्ष्मी की अभिन्नता का प्रतिपादन
किया गया है।
उपर्युक्त तर्क के अतिरिक्त भी यह ध्यान देने योग्य बात है कि युद्धकाण्ड के बाद दो बार समस्त रामकथा
का सिंहावलोकन प्रस्तुत किया गया है (सर्ग १२४ और १२६), किन्तु इसमें अग्निपरीक्षा का उल्लेख नहीं होता।
बालकाण्ड के प्रारम्भ की दोनों अनुक्रमणिकाओं (सर्ग १ और सर्ग ३) का प्रामाणिक संस्करण अग्निपरीक्षा के
विषय में कुछ नहीं कहता। दो स्थलों पर राम सीता की निर्दोषता के प्रमाण का उल्लेख करते हैं। प्रथम बार सीता-
त्याग के समय वह केवल देवताओं के साक्ष्य की चर्चा करते हैं। दूसरी बार वे वाल्मीकि से कहते हैं मैंने लङ्कानिवास
के बाद सीता को तभी ग्रहण किया जब उन्होंने अपने सतीत्व की शपथ की थी। यदि उस सर्ग के रचनाकाल में
अग्निपरीक्षा का वृत्तान्त प्रचलित होता तो यहाँ पर राम द्वारा अवश्य ही सीता के सतीत्व के सब से महत्त्वपूर्ण प्रमाण
का उल्लेख हुआ होता। अतः यह मानना पड़ेगा कि उत्तरकाण्ड की आधिकारिक कथावस्तु के लिपिबद्ध होने के
पश्चात् ही अग्निपरीक्षा विषयक प्रक्षेप युद्धकाण्ड का अंश बन गया है।
महाभारत के रामोपाख्यान से भी हमारे निर्णय की पुष्टि होती है। रामायण के इस प्राचीनतम संक्षेप में
भी कहीं भी अग्निपरीक्षा का निर्देशमात्र भी नहीं मिलता। अग्निपरीक्षा के बाद दो सर्ग (११९ और १२०) भी
अनावश्यक हैं और प्रायः प्रक्षिप्त माने जाते हैं। इनमें शिव राम की स्तुति करते हैं, दशरथ दिखायी देते हैं तथा
इन्द्र राम का निवेदन स्वीकार कर मृत वानर सैनिकों को जीवित कर देते हैं।१”
बुल्के के उक्त शब्दाडम्बर का सार इतना ही है कि राम का सीता में बहुत प्रेम था। अकस्मात् उसमें
परिवर्तन कैसे हो सकता था ? युद्धकाण्ड, उत्तरकाण्ड तथा बालकाण्ड के संक्षिप्त वृत्तान्तों में अग्निपरीक्षा की चर्चा
नहीं है, अतः अग्निपरीक्षा प्रक्षिप्त है।
किन्तु बुल्के भारतीय परम्पराओं एवं संस्कारों से अपरिचित हैं। अतः उनके लिए यह असम्भव प्रतीत
होता है कि राम और सीता, विष्णु और लक्ष्मी थे। वे देवताओं का कार्य करने आये थे। यह सर्वथा प्रमाणसिद्ध
उन प्रमाणों को बुल्के धूलि-प्रक्षेपमात्र से झुठलाना चाहते हैं। भारतीय धर्म-शास्त्रों की दृष्टि से स्त्री-रक्षा एक अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण पहलू है। स्त्री-रक्षा से ही कुल, गोत्र आदि की रक्षा होती है; इसलिए धर्मशास्त्र कहते हैं—
“स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च।
स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥” (मनु० ९।७ )
तथा पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥” (मनु० ९।३ )
अर्थात् बाल्यकाल में पिता, यौवनकाल में पति, वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में स्त्री को रहना चाहिये;
वह कदापि पूर्ण स्वतन्त्र होकर न रहे। स्त्री की पवित्रता पर ही कुल और गोत्र की पवित्रता निर्भर होती है।
माता के सदाचारिणी होने पर ही व्यक्ति निश्चयपूर्वक अपने कुल-गोत्र का परिचय दे सकता है। माता का आचरण
सन्दिग्ध होने पर उसकी सन्तान का कुल-गोत्र भी सन्दिग्ध ही होगा। इस दृष्टि से, भारतीय सभ्यता के अनुसार,
स्त्री पिता, पति एवं पुत्र आदि संरक्षकों के बिना स्वतन्त्ररूप से नहीं रह सकती। पाश्चात्य देशों में ऐसी परम्परा
१. रामकथा, पृष्ठ ५३३, ५३४ (अनु० ५६५) ।