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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 236

अध्याय जैनमत में रामकथा १५९
इमामपि विशालाक्षीं रक्षितां स्वेन तेजसा ।
रावणो नातिवर्तेत वेलामिव महोदधिः ॥
न च शक्तः सुदुष्टात्मा मनसापि हि मैथिलीम् ।
प्रधर्षयितुमप्राप्यां दीप्तमग्निशिखामिव ।।
नेयमर्हति वैक्लव्यं रावणान्तःपुरे सती ।
अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा ॥
विशुद्धा त्रिषु लोकेषु मैथिली जनकात्मजा ।
न विहातुं मया शक्या कीर्तिरात्मवता यथा ।।”
( वा० रा० ६।१२०।१३-१९ )
“प्रत्ययश्च पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसन्निधौ ।
शपथश्च कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता ॥
लोकापवादो बलवान् येन त्यक्ता हि मैथिली ।
सेयं लोकभयाद् ब्रह्मन्नपापेत्यभिजानता ॥
परित्यक्ता मया सीता तद्भवान् क्षन्तुमर्हति ।” ( वा० रा० ७।९७।३,४ )
श्रीराम ने वाल्मीकि से कहा कि पहले ही लङ्का में देवताओं के सन्निधान में सीता का शपथ हो चुका
है । तभी सीता राजभवन में प्रविष्ट हुई थी । फिर भी लोकापवाद के कारण, सीता निष्पाप है, यह समझते हुए भी,
सीता का वन में त्याग किया गया है । आप क्षमा करें ।
रामायण से ही यह भी सिद्ध है कि रावण सीता के तेज का अतिक्रमण नहीं कर सकता था । उसे इस
सम्बन्ध में अनेक प्रकार के शाप दिये गये थे कि यदि इतः परं किसी अकामा स्त्री का कामभाव से स्पर्श करेगा
तो तत्क्षण भस्म हो जायगा । रावण ने कुबेर-पुत्र नलकूवर की निमन्त्रिता पत्नी रम्भा का बलात् घर्षण किया था ।
तभी नलकूवर ने शाप दिया था कि यदि किसी भी अकामा स्त्री को कामार्त होकर धर्षित करेगा तो उसी क्षण उसका
मस्तक सप्तधा विशीर्ण हो जायगा—
“उत्ससर्ज तदा शापं राक्षसेन्द्राय दारुणम् ।
तस्मात्स युवतीमन्यां नाकामामुपयास्यति ।।
यदा ह्यकामां कामार्तो धर्षयिष्यति योषितम् ।
मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविता तदा ॥
श्रुत्वा तु स दशग्रीवस्तं शापं रोमहर्षणम् ।
नारीषु मैथुनीभावं नाकामास्वभ्यरोचयत् ।।” (वा० रा० ७।२६।५५-५९)
रावण ने भी कहा है एक बार पुञ्जिकस्थला अप्सरा पितामह के भवन जा रही थी । तब मैंने बलात्
सम्भोग किया था । इसपर ब्रह्मा ने शाप दिया था कि आज से तुम यदि बलात् अन्य नारी का भोग करोगे तो
तुम्हारे मूर्धा के सौ टुकड़े हो जायेंगे—
“अद्यप्रभृति यामन्यां बलान्नारीं गमिष्यसि ।
तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥