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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 233

१५६ रामायणमीमांसा पञ्चम
"प्राप्तचारित्रसन्देहा मम प्रतिमुखे स्थिता ।
दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि मे दृढा ॥
कः पुमांस्तु कुले जातः स्त्रियं परगृहोुषिताम् ।
तेजस्वी पुनरादद्यात् सुहृल्लोभेन चेतसा ॥
रावणाङ्कपरिक्लिष्टां दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा ।
कथं त्वां पुनरादद्यां कुलं व्यपदिशन्महत् ॥
नहि त्वां रावणो दृष्ट्वा दिव्यरूपणां मनोरमाम् ।
मर्षयत्यचिरं सीते स्वगृहे पर्यवस्थिताम् ॥” (वा० रा० ६।११६।१७-२४)
उक्त वचनों से श्रीसीता के चरित्र के सम्बन्ध में सन्देह प्रकट किया गया है। सर्वत्र ही सन्देह शुद्धि की
भूमिका होती है । श्रीराम के ही वचनों द्वारा यह स्पष्ट है कि सीता के प्रति उनको कोई सन्देह नहीं था । केवल
संसार को विश्वस्त करने की दृष्टि से ही उन्होंने सीता को अग्निपरीक्षा के लिए अवसर दिया था । सीता के प्रति कुछ
अन्य लोगों को भी सन्देह हो सकता था, पर सन्देह भिन्न वस्तु है, मत या धारणा अन्य वस्तु है । ईश्वर नहीं है, धर्म
नहीं है, वेदप्रामाण्य नहीं है, यह मत नास्तिकता का है । सीता दुश्चरित्रा थी यह मत भी नास्तिकता का है । रामराज्य
में वैसा होना असम्भव था, ईश्वर है या नहीं, धर्म है या नहीं, वेदप्रामाण्य है या नहीं, सीता का लङ्का में शीलरक्षण
कैसे सम्भव हुआ ? यह शङ्का का स्वरूप है। शङ्का से ही जिज्ञासा, विचार, प्रमाण, पर्येषण, तत्त्वज्ञान एवं संशय-
निवृत्ति होती है ।
पूर्वोत्तरमीमांसा, खण्डनखण्डखाद्य, न्यायकुसुमाञ्जलि आदि ग्रन्थों में उसी रीति से तत्त्वनिर्णय किया
गया है । 'को हि वेद यद्यमुष्मिँल्लोके अस्ति वा न वा' कौन जानता है परलोक में कुछ है या नहीं, 'वयं ब्राह्मणाः स्मो
वा न वा' हम लोग ब्राह्मण हैं या नहीं । इस प्रकार की शङ्काएँ अर्थवादरूप में यज्ञ-मण्डप में अतीकाश ( वातायन )
रखने के लिए और प्रवरानुमन्त्रणा के लिए की गयी हैं। वस्तुतः परलोक में संशय हो तो यज्ञादि में प्रवृत्ति तथा
ब्राह्मणत्व में संशय होने से ब्राह्मणत्वादिमूलक कर्मों में प्रवृत्ति नहीं बन सकेगी। निष्कर्ष यह है कि वाल्मीकिरामायण
आदि में लङ्का में रहने के कारण सीता के शील में शङ्का व्यक्त की गयी है। वह भी शुद्धि की भूमिका के रूप में ।
परन्तु तेरापन्थी तुलसी की अग्निपरीक्षा में कैसा भौंडा लोक-मत वर्णित किया गया है। इसके अतिरिक्त अतीत
घटनाओं के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष या अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती । उनमें तो किसी सर्वज्ञ या योगज ऋतम्भरा
प्रज्ञावाला परम आप्त ही प्रमाण हो सकता है, न कि कोई दूरस्थ तुकबन्दी करनेवाला । पूर्वोक्त कथनानुसार महर्षि
वाल्मीकि ने योगजबल से जैसा दर्शन किया । उसके विपरीत किसी अन्य को कुछ भी कल्पना करने का किञ्चित् भी
अधिकार नहीं है । अतः जिन दुराचारिणी या पतिता आदि शब्दों के प्रयोग में कोई प्रमाण नहीं है, उनका प्रयोग
सर्वथा अनुचित ही है । माँ के लिए पिता द्वारा या विरोधी द्वारा दी गयी गालियों का पुत्र द्वारा अनुवाद भी पातक-
जनक अत्यन्त ही अनुचित व्यवहार है ।
वैदिक आदर्शों के अनुसार ही वाल्मीकिरामायण में सीता के सामने आते ही राम ने वे शङ्काएँ व्यक्त
की थीं जैसे कि कोई भी वैदिक पुरुष परगृहोषिता अपनी पत्नी के विषय में कर सकता था । श्रीसीता ने तत्काल ही
अग्नि-प्रवेश कर अपने परम पवित्र चरित्र को प्रमाणित किया। ठीक इसके विपरीत तेरापन्थी तुलसी के जैन राम
श्रीसीता के मिलने पर कुछ भी शङ्का नहीं करते। वे तो अयोध्या में राजगद्दी पर बैठने के बहुत दिनों बाद सीता के
अन्तर्वत्नी होने के पश्चात् जनापवाद के द्वारा सीता को वनवास देने को प्रस्तुत होते हैं। जनापवाद भी वाल्मीकि
के अनुसार बहुत मर्यादितरूप में आता है । सीता रावण द्वारा बलात् लङ्का ले जायी गयी । राक्षसों के पराधीन