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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

१४२ रामायणमीमांसा पंचम
"रामकथा की मिति जग नाहीं । अस प्रतीति जिनके मन माहीं ।
नाना भाँति राम अवतारा । रामायण शतकोटि अपारा ।।" (रा० मा० १।३२ (३)
का भी अभिप्राय है श्रीराम सबके हैं; पर आवश्यकता है मानने की ।
इसी तरह उस पुस्तक में कहा गया है—राम किसके हैं ? यदि तुलसीदास की भावना के अनुसार—
"कहाँ कहौं छवि आजु की भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै जब धनुष बाण लो हाथ ।।"
उनका यह वचन सुनकर कृष्ण तत्काल श्रीराम के रूप में परिवर्तित हो गए; तो फिर यह मानने में
क्यों झिझक होती है कि भगवान् राम ने जैनों की भावना का रक्षण करना भी अस्वीकार नहीं किया । भावना के
भूखे भगवान् को अपने ही साँचे में फिट करने की कल्पना करनेवाले आग्रही हैं, बेसमझ हैं । उन्हीं के कारण असीम
को ससीम बनानेवाले सम्प्रदाय फल फूल रहे हैं । वस्तुतः राम सर्वेश्वर हैं, अनन्त ब्रह्माण्ड के कण-कण उनके ही
हैं और वे सबके हैं । पर वैसा मानना ही आस्तिकता है न मानना नास्तिकता है ।
ऐसी स्थिति में यहाँ लेखक से प्रश्न है कि क्या वे कृष्ण की मूर्ति का रामरूप में परिवर्तित हो जाना
सत्य मानते हैं ? यदि नहीं, तो दृष्टान्त ही असिद्ध है फिर उसके आधार पर श्रीराम का जैन भावना के अनुसार
जैन हो जाना कैसे मान्य हो सकता है ? इसके अतिरिक्त दृष्टान्तमात्र वस्तुसिद्धि का हेतु नहीं होता । उसमें सद्
हेतु भी होना चाहिए । इसी लिए तो अग्नि के दृष्टान्त से जल को उष्ण नहीं कहा जा सकता । यदि उक्त घटना
सत्य है तो क्या लेखक और उसके अन्य जैन बन्धु तुलसीदास के समान ही श्रीराम को ईश्वरावतार मानते हैं ? यदि
नहीं तो भी उक्त कथन असङ्गत है । यदि मानते हैं, तो लेखक का स्वसिद्धान्तविरोध होगा; क्योंकि जैन-न्यायदर्शन,
न्यायकुमुदचन्द्र आदि ग्रन्थों में जब समारोह के साथ ईश्वर का ही खण्डन है तब जैनों के अनुसार राम को
ईश्वरावतार मानना वदतो व्याघात ही है । वैदिक दृष्टिकोण से तो ईश्वर सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् है । वही वेदादि
शास्त्रों के अनुसार श्रीराम हैं, वही श्रीकृष्ण हैं । फिर तो भक्त की भावना के अनुसार श्रीकृष्ण का श्रीराम हो
जाना कोई कठिन बात नहीं है । पर क्या कोई मनुष्य जीव भी किसी की भावना के अनुसार कुछ का कुछ हो
सकता है ? यदि कोई सिद्ध आम को कटहल बना दे तो वह उस सिद्ध की ही विशेषता होगी, आम की नहीं ।
यदि भावना के आधार पर वस्तुस्थिति में परिवर्तन हो तो क्या महावीरस्वामी को भावनावश कोई बौद्ध या वाम-
मार्गी या गोमांस-भक्षक बना सकता है ? और उसे आप का (पूर्वपक्षलेखक का) सिद्धान्त स्वीकार करता है ?
धर्मानन्द कौशाम्बी की 'भगवान् बुद्ध' नामक पुस्तक प्रकाशित है । उसमें उन्होंने लिखा है भगवान्
बुद्ध तथा महावीर सूकर आदि का मांस खाकर मरे थे । यदि यह बात उनके प्रमाणों एवं भावना के अनुसार ठीक
थी तो जैन विद्वानों ने उसका खण्डन क्यों किया था ? इसी लिए भावनाओं की भी सीमा होती है । शास्त्रानुसार
भावना से ईश्वर या देवताओं में भावनानुरूप रूप-भेद शास्त्रसम्मत है । "तं यथा यथोपासते" (श० ब्रा० १०।५।२।
२०) के अनुसार नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव परमेश्वर बद्ध जीव नहीं बन सकता । देहात्मवादी चार्वाक या वेद-
विरोधी जैन, बौद्ध ईश्वर नहीं हो सकता । सब कुछ ब्रह्म ही है यह बाधसमानाधिकरण व्यपदेश है । जैसे सर्प को
बाधित कर रज्जु सर्प है वैसे ही सबको बाधित करके ब्रह्म सब है । प्रबोधचन्द्रोदय में जैन क्षपणक तथा बौद्ध भिक्षु
को वाममार्गी बनते हुए दर्शाया गया है । क्या यह उनके भावनानुसार ठीक है ? आगे लेखक कहता है—ऋषभ को
हिन्दुओं ने विकृत करके पेश किया है । वह जैनों की भावनाओं को उभाड़नेवाला है; पर जैन उभड़े नहीं । उन्होंने
हिन्दुओं से इसके लिए तकरार नहीं की ।