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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 204

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १२७
“ततः पितामहो वाणीं त्वन्तरिक्षादभाषत ।
आगच्छ विष्णो ! भद्रं ते दिष्ट्या प्राप्तोऽपि राघव ॥
भ्रातृभिः सह देवाभैः प्रविशस्व स्विकां तनुम् ।
यामिच्छसि महाबाहो तां तनुं प्रविश स्विकाम् ॥
वैष्णवीं तां महातेजो यद्वाकाशं सनातनम् ।
त्वं हि लोकगतिर्देव न त्वां केचित् प्रजानते !।
ऋते मायां विशालाक्षीं तव पूर्वपरिग्रहाम् ।
त्वामचिन्त्यं महद्भूतमक्षयं चाजरं तथा !'
यामिच्छसि महातेजस्तां तनुं प्रविश स्वयम् ।।” (वा० रा० ७।१००।८-११)
श्रीपितामह का वचन सुनकर महामति राम अनुजों के साथ सशरीर वैष्णव तेज में प्रविष्ट हुए । जैसे जल
में जल प्रविष्ट होता है वैसे ही चिन्मय तेजःस्वरूप श्रीराम चिन्मय वैष्णव स्वरूप तेजःपुञ्ज में प्रविष्ट हो गये । एतावता
भगवान् का स्वरूप भौतिक न होकर चिन्मय तेजःस्वरूप ही होता है, यह सिद्ध है । “येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः”
(तै० ब्रा० ३।१२।९।७) जिस चिन्मय तेज से इद्ध होकर सूर्य तपता है वही चिन्मय तेज वैष्णवरूप है । न केवल
श्रीराम ही अपितु भरत आदि श्रीभगवान् राम के अनुज भी सशरीर ही वैष्णव तेज में प्रविष्ट हुए थे। उस समय
साध्य, मरुद्गण, इन्द्र, अग्नि सहित सब देवता, आदित्य, ऋषिगण, गन्धर्व, अप्सराएँ, दैत्य, दानव, मानव, राक्षस,
सुपर्ण, नाग, यक्ष आदि सभी ने भगवान् श्रीराम की अर्चना की । सभी पुष्ट एवं प्रमुदित हो गये । सबके मनोरथ पूर्ण
हुए । साधु साधु शब्द का सर्वत्र उद्घोष होने लगा । त्रिदिव त्रिताप रहित हो गया—
“पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्चित्य महामतिः ।
विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः ॥
ततो विष्णुमयं देवं पूजयन्ति स्म देवताः ।
साध्या मरुद्गणाश्चैव सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ॥
ये च दिव्या ऋषिगणा गन्धर्वाप्सरसश्च याः ।
सुपर्णानागयक्षाश्च दैत्यदानवराक्षसाः ॥
सर्वं पुष्टं प्रमुदितं सुसम्पूर्णमनोरथम् ।
साधु साध्विति तैर्देवैस्त्रिदिवं गतकल्मषम् ॥ (वा०रा० ७।११०।१२-१५)
उसके बाद विष्णुभावापन्न श्रीराम या रामस्वरूप विष्णु ने पितामह से कहा—“मेरे साथ में आये हुए
जनसमूह को उत्तम लोक देने की व्यवस्था करें। ये सब मेरे स्नेह से सब त्याग कर मेरा अनुगमन करनेवाले हैं, भक्त
हैं, अतएव भजनीय हैं ।” भगवान् विष्णु का वचन सुनकर ब्रह्मा पितामह ने कहा—“ये सब सन्तानक ( साकेत )
लोक को प्राप्त करेंगे । पशु-पक्षी जो भी आपका चिन्तन करते हुए प्राणत्याग करेंगे वे सभी सन्तानक लोक में निवास
करेंगे। वह सन्तानक लोक ब्रह्मलोक के सभी गुणों से युक्त है। ब्रह्मलोक के अनन्तर है। सभी वानर और ऋक्ष
आदि तक उसी लोक को प्राप्त हो गये । ब्रह्मलोकनिवासियों के समान ही उन्हें निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार और
शुद्धब्रह्म की प्राप्ति भी उनके हस्तगत ही है—
“अथ विष्णुर्महातेजाः पितामहमुवाच ह ।
एषां लोकं जनौघानां दातुमर्हसि सुव्रत ॥