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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०९
उत्पन्न होती हैं । पक्षियों से अण्डों के रूप में बच्चे उत्पन्न होकर गर्भ से बाहर ही पालित पोषित होते हैं । फिर
अगर ६० हजार सन्तानें भृगु जैसे महर्षि के सङ्कल्प से सुरक्षित हो जायें तो आश्चर्य की बात ही क्या है ?
पुनश्च जब वैदिक सिद्धान्त में प्रत्यक्ष और अनुमान के समान ही शब्द भी स्वतन्त्ररूप से प्रमाण है तब
शब्द प्रमाण से सिद्ध पदार्थ में किसी आस्तिक की विप्रतिपत्ति ही क्यों होगी ?
आज के वैज्ञानिक युग में तो ऐसी शङ्का ही उपहासास्पद है । कृत्रिम गर्भाधान और पोषण भी असम्भव
नहीं है ।
आगे कौसल्यायन के काल्पनिक मिथ्या वासुदेव राम कहते हैं—"हमें यह भी बताया गया कि पृथ्वी को
खोदने पर सगर-पुत्रों की चार ऐसे गजराजों से भेंट हुई जो पृथ्वी को अपने सिर पर उठाये हुए थे । हमें समझाया
गया कि जब गजराज सिर हिलाते हैं तभी भूकम्प होता है । हम सोचने लगे कि पृथिवी तो हाथियों के सिर पर
स्थित है, किन्तु स्वयं हाथी किस पर स्थित हैं ? हमें अपनी किसी शङ्का का सन्तोषजनक समाधान मुनि विश्वामित्र
से सुनने को नहीं मिला ।”
"यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागजाः ।
खेदाच्चालयते शीर्षं भूमिकम्पस्तदा भवेत् ॥” ( वा० रा० १।४०।१५ )
परन्तु यह शङ्का अविवेकमूलक ही है; क्योंकि वहाँ पर आकर्षिणी, विकर्षिणी, धारिणी, पोषणी शक्ति-
विशिष्ट चेतन ही गजेन्द्र के रूप में पृथिवी को धारण करते हैं और वे स्वयं स्वप्रकाश स्वप्रतिष्ठ भगवान् में ही
प्रतिष्ठित होते हैं ।
परस्पर आकर्षण से स्थिति आधुनिक लोगों को भी मान्य है । गणपति भगवान् का भी गजानन प्रतीक
गणपति अथर्वशीर्ष आदि में वर्णित है । भूमि के भी भीतर होनेवाली रासायनिक प्रक्रिया एवं तन्मूलक विस्फोट आदि
भी उन्हीं शक्तियों के परिणाम हैं । प्रतिक्रिया के अनन्तर होनेवाली शान्ति ही उनका उद्देश्य है ।
इसी तरह कौसल्यायन के राम ने इन्द्र और अहल्या की चर्चा की है । उन्होंने कहा—"गौतम के शाप
से अहल्या पत्थर की हो गयी थी । मेरे चरणस्पर्श से वह पूर्ववत् पुनः जीवित हो गयी । ऐसा कहनेवाले के मन में
स्त्रीजाति के लिए तनिक भी आदर भाव नहीं रहा होगा । ऐसा कहनेवाले ने स्त्रीजाति के साथ मेरा भी निरादर
किया है ।”
परन्तु यह मिथ्या ही है । वाल्मीकिरामायण में राम ने वैसा कुछ भी नहीं कहा है । हाँ, वाल्मीकि के
राम ने लक्ष्मण के साथ मुनि-पत्नी का चरणस्पर्श किया, यह ठीक है—
"राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा ।” ( वा० रा० १।४९।१७ )
पर साथ ही राम के स्पर्श से वह शापमुक्त हुई और अनेक सहस्रवर्ष तक वायुभक्षण करती हुई निराहार
और भस्मशायिनी होकर तप करती रही । यह सब साधारण लोक से विलक्षण बातें तो थीं ही—
"इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि ।
वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी ॥” ( वा० रा० १।४८।२९,३० )
अहल्या ने समाहित होकर अर्घ्य, पाद्य आदि से श्रीराम का पूजन किया । महातेजा गौतम ने भी आकर
राम की विधिवत् पूजा की—
"गौतमोऽपि महातेजा अहल्यासहितः सुखी ।
रामं सम्पूज्य विधिवत्तपस्तेपे महातपाः ॥” ( वा० रा० १।४९।२१,२२ )