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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०५
फिर अयोध्याकाण्ड में भी भरत मातुलकुल गये और अयोध्या आते समय बहुत से राजकीय उपहार उनके
साथ भेजे गये । उन महाराज कैकेय की पुत्री कैकेयी को शूद्रा एवं परिवृत्ति कहना साहस ही है ।
अन्य रामायणों के अनुसार सुमित्रा का वैश्यपुत्री होना भी अप्रामाणिक है । रघुवंश ९।१७ के अनुसार
सुमित्रा मगधनरेश की पुत्री थीं । यहाँ वावाता और परिवृत्ति दोनों शब्द कृताभिषेका महिषी से भिन्न क्रमेण द्वितीय
तथा तृतीय भार्याओं के ही बोधक हैं। इसी दृष्टि से सुमित्रा को वावाता और कैकेयी को परिवृत्ति कहा गया है ।
“राज्ञां हि विविधाः स्त्रिय उत्तममध्यमाधमजातियाः ।”
इत्यादि ऐतरेयब्राह्मण तृतीय पञ्चिका के वावाता शब्द के भाष्य के अनुसार यदि वैश्य और शूद्र जाति
की राजवल्लभा पत्नियाँ हों तो उनका भी नियोजन होता है; परन्तु अनिवार्यरूप में वैसा अपेक्षित नहीं है। अतएव
श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ में कृताभिषेका महिषी सीता की काञ्चनी प्रतिमा का ही उपयोग हुआ था। वहाँ अन्य
जातीया भार्याओं का प्रसङ्ग ही नहीं आया। काञ्चनी प्रतिमा से भी यज्ञ सम्पन्न होना वैध है, यह इसी ग्रन्थ में
अन्यत्र देखिये ।
इसी तरह अन्यत्र भी कौसल्यायन ने वाल्मीकि का नाम लेकर उनका अभिप्राय न समझकर या जान-
बूझकर श्लोकों का भ्रामक अर्थ करके जनता को भ्रान्त करने का प्रयत्न किया है ।
'हे मिथ्याप्रतिज्ञ ! तू शूर वीर हो ।' (रामकहानी पृ० ४)
यह अर्थ भी इसी प्रकार का है। मूल में संबोधन रूप में 'मिथ्याप्रतिज्ञ' शब्द का प्रयोग नहीं किया
गया है—
"यदीदं ते क्षमं राजन् गमिष्यामि यथागतम् ।
मिथ्याप्रतिज्ञः काकुत्स्थ सुखी भव सुहृद्वृतः ॥” ( वा० रा० १।२१।३ )
अर्थात् यदि प्रतिज्ञाहानिरूप दोष आपको सह्य है तो मैं जाता हूँ । आप मिथ्याप्रतिज्ञ होकर अपने
सुहृदों के साथ सुखी हों ।
'विश्वामित्र के कहने से हमने ताड़का का वध कर डाला । आखिर हम क्या करते, हमसे चलते समय
पिताजी ने कहा था कि विश्वामित्र की हर आज्ञा का पालन करना । हम अपनी बुद्धि से विचार करने में स्वतन्त्र
न थे।' (रामकहानी पृ० ५१ )
यह भी मिथ्यावादी बौद्धों के मिथ्या भाषण का ही नमूना है, क्योंकि वाल्मीकीयरामायण में ऐसा
उल्लेख नहीं है। श्रीराम ने मारीच को मारा नहीं, किन्तु 'मानव परमास्त्र' से सौ योजन दूर डाल दिया था ।
सुबाहु तथा अन्य बहुत से राक्षसों का वध कर वे ऋषियों द्वारा पूजित एवं प्रशंसित हुए थे ।
हाँ, अयोध्याकाण्ड में जब जाबालि ने राम को लौटाने के लिए धर्मविरुद्ध नास्तिकों जैसी बाते करते
हुए कहा—"कौन किसका बन्धु है । किसको किससे क्या लेना है । प्राणी अकेला ही उत्पन्न होता है। जो उसमें माता-
पिता की बुद्धि करता है वह उन्मत्त ही है । आप अपने पित्र्य राज्य को त्यागकर बहुकण्टक कुत्सित पथ का आश्रयण
कर रहे हैं । जो लोग धर्मपरायण होते हैं, उनके लिए ही हम सोचते हैं । वे यहाँ भी दुःख पाते हैं। अन्त में विनाश
को प्राप्त हो जाते हैं आदि ।
ब्राह्मण आदि अन्य के भोजन करने से यदि देवताओं तथा पितरों को कुछ मिल सकता हो, तब तो
प्रवासी सम्बन्धियों को घर में ही दिया हुआ अन्न आदि मार्ग में मिल जाना चाहिए, फिर मार्गार्थ सामग्री-सङ्कलन
व्यर्थ होगा। अतः देवताओं तथा पितरों सम्बन्धी अष्टका श्राद्ध केवल अन्न का अपव्ययमात्र है। यज्ञादि में देवपूजा
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