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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०३
ब्राह्मण याज्ञिक वेदप्रमाण के अनुसार यज्ञ, यागादि करते थे । मनमानी कुछ भी नहीं करते थे । यहाँ
कौसल्यायन का वैदिक यज्ञ के हिंसामय प्रतीत होने वाले विधानों पर व्यङ्ग्य है ।
'श्रीराम के भोजन में माँस और सुरापान अंग रहा था। आज के वैष्णव पाठक को यह समझना चाहिए
कि उसके विष्णु के अवतार भगवान् राम भले ही वैष्णवयुग की उपज हों; किन्तु स्वयं श्रीराम वैष्णव युग की उपज
नहीं। वे जिस युग की विभूति थे, उसका प्रतिनिधित्व करना स्वाभाविक था।' यह विचार भी अविवेकमूलक है।
श्रीराम विष्णु या विष्णु के अवतार थे—यह शाश्वत सिद्धान्त है, वे किसी युग की उपज नहीं थे । वेदवेद्य श्रीराम
के अवतीर्ण होने पर साक्षात् वेद ही रामायण के रूप में प्रकट हुए थे । श्रीराम सर्वान्तरात्मा हैं, अतः विभिन्न युगों
के अनुरूप उनके भोजन में भेद हो सकता है। पर सर्वदा ही मर्यादापुरुषोत्तम के व्यवहार में भी वेद का नियन्त्रण
तो रहता ही है।
बुद्ध की अहिंसा का बिल्ला बाँधनेवाले बौद्धों के बुद्ध तो किसी धोबिन के द्वारा दत्त शूकरमांस भक्षण
करके मृत्यु को प्राप्त होते हैं। क्या कौसल्यायन बतायेंगे कि उन्होंने किस युग का प्रतिनिधित्व किया था। प्रियावियोग
में राम के व्याकुल होने आदि की नरलीला भी ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य होकर मुक्तिका हेतु बनती है । गीता कहती
हैं कि भगवान् के दिव्य जन्म और कर्म को जो जानता है वह जन्म और कर्म के बन्धनों से मुक्त हो जाता है—
“जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥” (गी० ४।९ )
अपने समर्थन में कौसल्यायन ने एक जैन श्लोक उद्धृत किया है—
“पक्षपातो न मे वीरे न द्वेषः कपिलादिषु ।
युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कार्यः परिग्रहः ॥”
अर्थात्—मेरा महावीर में पक्षपात नहीं एवं कपिलादि में द्वेष नहीं है । जिसका भी वचन प्रकृतिसम्मत,
युक्तियुक्त हो उसका ही परिग्रह करना चाहिये । पर यदि कौसल्यायन सचमुच उक्त वचन का आदर करते हैं, तो
नैरात्म्यवाद तथा अनेकान्तवाद को त्याग कर उन्हें अनादि अपौरुषेय स्वतःसिद्ध वेदों के अनुसार ही धर्म, ब्रह्म की
शरण ग्रहण करनी चाहिये ।
कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं—"जैसे कोई नहीं जानता कि उसका जन्म कब और कहाँ हुआ
वैसे ही मैं भी नहीं जानता कि मेरा जन्म कैसे, कब और कहाँ हुआ ?” परन्तु यह गीता के विरुद्ध है । गीता के
भगवान् कहते हैं—"हमारे और तुम्हारे कई जन्म हुए, पर उन सबको मैं जानता हूँ । हे परन्तप ! तुम नहीं
जानते हो"—
“बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥” (गी० ४।५ )
कौसल्यायन अपने जन्म के बारे में कहते हैं—"मैंने सुना है कि जब मेरे पिता सन्तानोत्पत्ति की ओर
से निराश हो गये, तब उन्होंने वसिष्ठ के सहयोग से 'अश्वमेध यज्ञ' किया । राजा रोमपाद के जामाता ऋष्यशृङ्ग
बालब्रह्मचारी थे । वे वेश्याओं के द्वारा लुभाकर अपनी कन्या शान्ता के लिए वररूप में प्राप्त किये गये थे । यज्ञ में
३०० पशु यज्ञस्तम्भों में बाँधे गये थे । उनमें अश्वमेध का यज्ञीय अश्व भी था । मेरी माता कौशल्या ने धर्म की
इच्छा से एक रात उस अश्व के निकट गुजारी थी । इससे पहले भली प्रकार अश्व की परिचर्या करके तीन तलवारों
से उसका स्पर्श किया था । इनके बाद याज्ञिकों ने मेरे पिता की अन्य दो भार्याओं को भी घोड़े के साथ नियोजन