रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७१
अर्थात् कल्पान्तरों के बीतने पर स्रष्टा के नवीन सृष्टि-विधान में ब्रह्मा के चेतस् से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसे
ही, ब्रह्मा के प्रकृष्ट चित्त से आविर्भूत होने के कारण, प्रचेता कहा गया है । तथा च ब्रह्मा के मानस पुत्र ही प्रचेता हुए
हैं । ब्रह्मा के दस पुत्र मनु आदि स्मृतियों में प्रसिद्ध हैं-
"अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ।
पतीन् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश ॥" (मनु० १।३४)
ब्रह्मा कहते हैं- 'मैंने प्रजा-सृष्टि की इच्छा से सुदुश्चर तप करके दस प्रजापति महर्षियों की सृष्टि की । वे
थे मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद-
"मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ॥" (मनु० १।३५)
महाभारत के सम्भवपर्व में ७५ अध्याय के चौथे श्लोक में कहा गया है प्रचेता के दस पुण्यजन पुत्र हुए हैं-
"दश प्रचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः ।"
प्राचेतस मुनि ही वाल्मीकि हैं, यह मार्कण्डेयपुराण से सिद्ध है-
"उवाच प्रणतो वाक्यं वाल्मीकिं च तपोधनम् ।
प्राचेतस महाभाग श्रीरामस्य कथां शुभाम् ॥
कथयस्व महाबुद्धे रामस्य परमात्मनः ।"
ब्रह्मा के इन दस पुत्रों में नौ प्रजा-सृष्टिकर्ता हुए हैं । दशम पुत्र ने शतकोटिप्रविस्तर रामायण रचकर
ब्रह्मा से सृष्ट प्रजा को ज्ञान-प्रदान किया था । सृष्टिकर्ता न होने से ही नौ प्रजापतियों में उनकी गणना नहीं है ।
तथा च शिवरामायण में कहा है-
"पुरा स्वायम्भुवो ह्यासीत् प्राचेतस महाद्युतिः ।
ब्रह्मात्मजस्तु ब्रह्मर्षिः तेन रामायणं कृतम् ॥
शतकोटिप्रविस्तीर्णं नानाकल्पसमुद्भवम् ।
स कदाचिद् ब्रह्मलोके धातारञ्चाप्यनिन्दत् ॥
स्वसुताग्रहणात्तेन शप्त आप निषादताम् ।
चमत्कारपुरे भूत्वा भार्गवान्वयसम्भवः ॥
लोहजङ्घो द्विजो ह्यासीद् ऋक्षनामान्तरो हि सः ।
मातापित्रोः सेवया स कञ्चित्कालं गृहे वसन् ॥
भार्यां पतिव्रतां साध्वीं तां परित्यज्य स द्विजः ॥
ब्राह्मीं वृत्तिं परित्यज्य चोरकर्म समाचरत् ।
नारदेनोपदिष्टस्तु तपोनिष्ठां समाश्रितः ॥
वल्मीकमभवत्तस्य शरीरे नारदाज्ञया ।
वल्मीकनिर्गमाद् ब्रह्मा वाल्मीकिरिति चाब्रवीत् ॥"
अर्थात् प्राचीनकाल में स्वायंभव प्राचेतस महामुनि ब्रह्मा के पुत्र हुए थे । उन्होंने ही शतकोटि श्लोकों का
सुविस्तृत रामायण ग्रन्थ रचा है । वह राम के विभिन्न कल्पों के चरित्रों का सङ्कलन था । उन्होंने ब्रह्मलोक में
ब्रह्मा की, स्वसुता का ग्रहण करने के कारण, निन्दा की थी । इसलिए वे ब्रह्मा के शाप से निषाद हो गये । उसके