रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्व की ही रचना मानते हैं। प्रकृत में इतना उनको भी कहना पड़ता है कि महाभारत में रामायण के पात्रों और
वाल्मीकिरामायण का भी वर्णन है; परन्तु रामायण में महाभारत के पात्रों का वर्णन नहीं है। कहा जाता है कि
पाणिनि-सूत्रों में भारत के विषयों का निर्देश मिलता है परन्तु रामायण के विषयों का नहीं मिलता। पर यह सर्वथा
अशुद्ध है। पाणिनि-सूत्रों में कौशल्या, कैकेयी, शूर्पणखा आदि का निर्देश मिलता है यह पीछे कहा जा चुका है।
इसी तरह भारत का पश्चिम में, रामायण का पूर्व में निर्माण मानना भी निर्मूल है। इसी आधार पर कुछ लोग
रामायण की कथावस्तु को भी भारत के बाद की मानते हैं जो सर्वथा श्रुति, स्मृति, पुराण तथा इतिहास के विरुद्ध
है। पुराणों के अनुसार वैवस्वत मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में श्रीराम का जन्म हुआ है। श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर आदि
का जन्म अट्ठाइसवें द्वापर में हुआ, अतः भारतीय शास्त्रों एवं विद्वानों के अनुसार रामायण से बहुत काल के
पश्चात् भारत या महाभारत का निर्माण हुआ। महाभारत के ही एक अंश गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं,
शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ—
"रामः शस्त्रभृतामहम्" (गी० १०।३१)
इसी तरह आरण्यकपर्व में भीम कहते हैं, बुद्धि, सत्त्व और बल से सम्पन्न, गुणश्लाघ्य शूर मेरे भ्राता
वानरपुंगव हनुमान् रामायण में प्रसिद्ध हैं—
"भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः ।
रामायणोऽतिविख्यातः शूरो वानरपुङ्गवः ॥" (म० भा० ३।१४७।११)
इसी प्रकार हरिवंशोक्त भारत-श्रवण की विधि में कहा है—
"वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ ।
आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥" (म० भा० १८।६।२३)
इस तरह भारत में वेद के समान ही रामायण का उल्लेख है। महाभारत में अनेक स्थलों पर वाल्मीकि
का तपस्वी महर्षि के रूप में उल्लेख है। इतना ही नहीं वाल्मीकिरामायण का श्लोक भी महाभारत में
उद्धृत है—
"अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि ।
पीडाकरममित्राणां यत्स्यात् कर्तव्यमेव तत् ॥
न हन्तव्याः स्त्रिय इति यद् ब्रवीषि प्लवङ्गम ।
सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा ॥" (म० भा० ७।११८।४८)
अर्थात् वाल्मीकि ने यह श्लोक गाया है कि अमित्रों को जो भी अप्रिय हो वह करना ही चाहिये ।
शान्तिपर्व में गोविन्द की महिमा गानेवालों में असित, देवल और मार्कण्डेय के साथ वाल्मीकि का भी
उल्लेख है।
नलोपाख्यान के सुदेव का स्वागतभाषण (म० भा० ३।६८।८-२६) रामायण से उद्धृत है। इससे
स्पष्ट होता है कि रामायण महाभारत से प्राचीन है।
भारत तथा महाभारत की कल्पना निर्मूल
बुल्के कहते हैं—"परन्तु महाभारत के प्राचीनतम पर्वों में रामायण एवं वाल्मीकि का उल्लेख नहीं है।
उनमें राम-कथा के पात्रों का उल्लेख है। इससे प्रतीत होता है भारत के कवि राम-कथा और उसके प्रधान पात्रों
से परिचित थे।" यह भी भारतीय शास्त्रों एवं विद्वानों की दृष्टि में अत्यन्त असंगत है।