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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६५
हैं । अन्य कथाओं में तो केवल नाममात्र का भेद है । एक ही व्यक्ति के कई नाम हो सकते हैं, अथवा देश-भेद से
उनके नाम-भेद उपपन्न हो जाते हैं । अन्य कथाओं में भी उन्हें भृगुवंशीय मानने में कोई बाधा नहीं है, क्योंकि किसी
भी कथा में उसके विपरीत वर्णन नहीं है । अध्यात्मरामायण में स्वयं वाल्मीकि द्वारा ही इ'वृत्त वर्णित है । अतः
उसी के साथ सबका समन्वय होना ठीक है । जैसे छान्दोग्योपनिषद् में तेज, अप् और अन्न पूर्विका सृष्टि का वर्णन
है और प्रश्नोपनिषद् में भिन्न क्रम है—
'तत्तेजो असृजत' (छा० उ० ६।२।३), “स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः
पृथिवीन्द्रियम् ॥” ( प्र० उ० ६।४ ) मुण्डक में और भिन्न है—
“ एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥” ( मु० उ० २।१।३ )
तथा तैत्तिरीय में अन्य है—“तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः” ( तै० उ० २।१ ) इस प्रकार
प्रश्न, मुण्डक आदि में क्रमरहित सृष्टि का वर्णन है । तैत्तिरीयोपनिषद् में आकाश, वायु, तेज, और पृथिवी के क्रम से
सृष्टि का वर्णन है ।
उत्तरमीमांसा में तैत्तिरीयश्रुति के अनुसार अन्य श्रुतियों का समन्वय किया गया है। इसी तरह छान्दोग्य
तथा बृहदारण्यक उपनिषदों की पञ्चाग्निविद्या का समन्वय है—
“असौ वाव लोको गौतमाग्निः” ( छा० उ० ५।४।१ ),
“अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समित् ॥ ( बृ० उ० ६।२।१४)
पञ्चाग्नि-विद्या छान्दोग्य और बृहदारण्यक दोनों उपनिषदों में हैं । वहाँ छान्दोग्य उ० में द्यु, पर्जन्य,
पृथिवी, पुरुष, योषित् इन पाँच अग्नियों का वर्णन है । परन्तु बृहदारण्यक उ० में षष्ठ लौकिक अग्नि का भी वर्णन
है; पर दोनों शाखाओं की पञ्चाग्निविद्या एक ही हैं, अतः जैसे बृ० उ० के अनुसार ही छा० उ० की सङ्गति लगा
ली जाती है वैसे ही अध्यात्मरामायण की कथा के साथ ही वाल्मीकिसम्बन्धी अन्य कथाओं का भी समन्वय समझना
चाहिये । उसमें कहा है—
“अहं पुरा किरातेषु किरातैः सह वर्धितः ।
जन्ममात्रं द्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ॥
“शूद्रायां बहवः पुत्रा उत्पन्ना मेऽजितात्मनः ।
तत्तच्चौरैश्च संगम्य चोरोऽहमभवं पुरा ॥” ( अ० रा० २।६।६४,८७ )
कथा यों वर्णित है—वाल्मीकि ने कहा, मैं प्राचीनकाल में किरातों के मध्य में रहकर किरातप्राय हो
गया था । केवल जन्ममात्र से मैं द्विज ( ब्राह्मण ) था, परन्तु आचरण सब मेरे शूद्रों के से थे, शूद्रा पत्नी में मेरे
बहुत से पुत्र भी उत्पन्न हुए । चोरों के साथ रहते रहते मैं भी चोर हो गया ।
एक बार मैंने वन में अग्नि एवं सूर्य के समान दिव्य प्रकाशवाले मुनियों को देखा । उनके वस्त्रादि लेने
के लिए मैं उन्हें पकड़ने दौड़ा । मुनियों ने मुझे देखकर पूछा—क्या करना चाहते हो ? मैंने कहा, मेरे बहुत से
बुभुक्षित पुत्र, स्त्री आदि हैं । उनके रक्षणार्थ में जङ्गल में लोगों को मारकर धन-हरण करता हूँ ? उन्होंने कहा—
तुम कुटुम्ब के लोगों से जाकर पूछो कि जो मैं तुम लोगों के लिए प्रतिदिन पाप करता हूँ उसमें तुम लोग भी भागी-
दार हो कि नहीं ? मैंने जाकर पूछा तो कुटुम्बवालों ने कहा—हम लोग तो धनादि फल के ही भागी हैं, पाप के
नहीं । यह सुनकर मेरे मन में निर्वेद, वैराग्य एवं ग्लानि उत्पन्न हो गयी । मैं मुनियों की शरण में गया । करुणापूर्ण
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