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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ३७
लिए भी दिव्य गुणगण-सम्पन्न, सौन्दर्य, माधुर्य आदि से परिपूर्ण श्रीविग्रह का निर्माण कर ही सकता है। जैसे जीव
स्वरूपतः निराकार होते हुए भी साकार विग्रह-सम्पन्न होता है वैसे ही ब्रह्म भी निराकार और निर्गुण होने पर
भी, दिव्य लीला-शक्ति से, सच्चिदानन्दमय श्रीविग्रह धारण करता है। जैसे निराकार काष्ठादि में व्यापक अग्नि,
संघर्षणादि व्यापार से, दाहक. और प्रकाशक विशिष्ट अग्नि-शिखा के रूप में प्रकट होता है उसी प्रकार निराकार
और निर्विकार ब्रह्म भी अपनी अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्ति के योग से सगुण और साकार सच्चिदानन्दमय परब्रह्म के
रूप में प्रकट होता है अथवा जैसे जल हिम के रूप में व्यक्त होता है उसी प्रकार निराकार ब्रह्म साकार ब्रह्म हो
जाता है।
"प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः ।
यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥" (यजुःसं० ५।२०)
अर्थात् जिन विष्णु के तीन महान् आक्रमणों (पाद-विक्षेपों) के आधारभूत लोकों में सम्पूर्ण भुवन तथा
भूतजात अन्तर्भूत हो जाते हैं वे विष्णु उसी प्रकार अपने पराक्रम से पूजित होते हैं जैसे दुर्गम पर्वतों में रहनेवाला
सिंह अपने पराक्रम से पूजित होता है। यहाँ 'भीमो मृगः' इस शब्द से नृसिंहावतार सूचित होता है । 'कुचरः' से
भूमिचारी राम, कृष्ण आदि का अवतार भी सूचित होता है । 'त्रिषु विक्रमणेषु' के द्वारा वामनावतार का सूचन
है। यही बात "कौ पृथिव्यां चरतीति कुचरः मत्स्यकूर्मादिरूपेण" कहकर उव्वट ने भी सूचित की है।
"प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।
तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥" (यजुःसं० ३१।१९)
प्रजापति (ईश्वर) गर्भ के भीतर विद्यमान होते हैं। वे वस्तुतः अजायमान नित्य-कूटस्थ होने पर भी
राम, कृष्ण आदि रूप से बहुधा आविर्भूत होते हैं।
"एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः ।
स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥" (यजुःसं० ३२।४)
यह देव सभी दिशाओं में व्याप्त होकर स्थित है। हे जनो, वह प्रसिद्ध देव पहले भी अनेक रूपों में
उत्पन्न हुआ है और वही गर्भ के मध्य में रहता है। वही जात होकर भी पुनः उत्पत्स्यमान होता है। वही अपनी
अचिन्त्य शक्ति से प्रत्येक पदार्थों में व्याप्त होकर सर्वतोमुख रहता है।
"त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णोर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ।” (ऋ०सं० १।२२।१८)
व्यापक अदाम्य अर्थात् किसी के द्वारा जिसका हिंसन असम्भव है वही विष्णु गोप अर्थात् सबका रक्षक
है। वह पृथिवी आदि लोकों को अपने तीन पदों से अधिष्ठित करता है। उसी से अग्निहोत्रादि धर्मों का धारण
होता है। इस मन्त्र से भी व्यापक सर्वरक्षक परमेश्वर का त्रिविक्रमावतार सिद्ध होता है ।
"स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते ।
विभूतिरस्तु सूनृता ॥” (ऋ० सं० १।३०।५)
इस मन्त्र से राधापति कृष्ण और राधा का अवतार रूप से अस्तित्व प्रमाणित होता है । राधा शब्द
का 'धन' भी अर्थ है। परन्तु 'राधा' का वैभव होने से ही धन 'राधा' पदवाच्य होता है और वही राधातत्त्व पर-
मेश्वर से स्तुत्य होने से वाणी द्वारा उद्यमान होता है। उसी की प्रिय सत्यरूपा लक्ष्मी विभूति है ।
"ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः ।
अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि ॥" (ऋ० सं० १।१५४।६)