रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपासना में अपेक्षित होती है। हाँ, रामचन्द्र के सम्बन्ध में उनकी निम्नोक्त कल्पना ठीक भी हो सकती है कि राम
के सौन्दर्य तथा लोकप्रियता की अभिव्यञ्जना के लिए वाल्मीकि ने बहुत स्थलों पर चन्द्रमा से राम की तुलना
की है—
( रामं ) चन्द्रमिवोदितम् ( अयोध्याकाण्ड ४४।२२ )
( राममुखं ) पूर्णचन्द्रमिवोदितम् ( युद्धकाण्ड ३३।३२ )
( रामस्य ) पूर्णचन्द्राननस्याथ ( अयोध्याकाण्ड १।४४ )
( रामः ) सोमवत्प्रियदर्शनः ( बालकाण्ड १।१८ )
( रामः ) लोककान्तः शशी यथा ( सुन्दरकाण्ड ३४।२८ )
( रामवदनम् ) उदितपूर्णचन्द्रकान्तम् ( युद्धकाण्ड ११४।३५ )
क्या देवता काल्पनिक हैं ?
मिस्टर बुल्के एवं उनके जैसे विचारवाले बहुत से पाश्चात्य और उनसे प्रभावित भारतीय विद्वान् भी देवताओं
को केवल काल्पनिक मानते हैं । उनके अनुसार पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ के अग्नि, वायु, इन्द्र या आदित्य आदि
प्रकृति और उसकी विभिन्न शक्तियों में ही देवता की कल्पना कर ली गयी है । परन्तु यह वेदादि शास्त्रों का तात्पर्य
न समझने के कारण उनका भ्रम ही है; अन्यथा संसार के सर्व-प्राचीन और सर्वश्रेष्ठ ऋग्वेद में जिन प्रधान देवताओं
का दो सौ सूक्तों के द्वारा स्तवन किया गया है, 'वे केवल जड़ एवं प्राकृतिक वस्तु हैं'—यह कहना कहाँ तक
सङ्गत हो सकता है ? जब कि वैदिक ऋषि सदा से ही प्रकृति एवं प्राकृत व्यष्टि, समष्टि, स्थूल, सूक्ष्म, कारण, सब
प्रपञ्चों से अतीत, निर्विकार, असङ्ग चेतन वस्तु को जानते और पूजते रहे हैं । जड़ अचेतन वस्तु की प्रार्थना
करना और उससे कुशल-क्षेम की आशा रखना शुद्ध मूर्खता ही हो सकती है, अतः जैसे जड़ देहादि के द्वारा
देहत्रयाभिमानी आत्मा के ही अर्चन, प्रार्थना आदि होते हैं वैसे ही पृथिवी आदि लोकों में उनके अग्नि आदि प्रधान
तत्त्वों के द्वारा तत्तत् अभिमानी महान् शक्तिशाली चेतन ईश्वर के अंशभूत देवताओं का ही स्तवन आदि किया
जाता है—
'यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यम-
यत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।।' ( बृ० उ० ३।७।३ )
जो पृथ्वी में रहता हुआ, पृथ्वी के भीतर है, पृथ्वी जिसको नहीं जानती, पृथ्वी जिसका शरीर है, जो पृथ्वी के
भीतर रहता हुआ पृथ्वी को नियन्त्रित करता है, वही अन्तर्यामी तुम्हारा आत्मा है और वह अमृत है । यहाँ 'पृथ्वी
जिसको नहीं जानती' इस कथन से ज्ञानशक्तिसम्पन्न पृथ्वी की अभिमानिनी देवता विवक्षित है ।
'योऽप्सु तिष्ठन्', 'योऽग्नौ तिष्ठन्', 'योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्', 'यो वायौ तिष्ठन्', 'य आकाशे तिष्ठन्' 'यः
प्राणे तिष्ठन्····' ( बृ० उ० ३।७।४,५,६,७,१२,१६ )
इत्यादि मन्त्र, उपनिषद् एवं विभिन्न इतिहास आदि में भूत, भौतिक, भोग्य, भोक्ता आदि के रूप में एक
व्यापक अन्तर्यामी तत्त्व का विस्तार से वर्णन है । “अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम्” ( ब्र० सू० २।१।५ )
में विशेषरूप से भगवान् बादरायण ने पृथिव्यादि के अभिमानी ज्ञान, ऐश्वर्य और शक्ति से सम्पन्न देवता का
प्रतिपादन किया है, अतः यह कहना कि 'विकासक्रम से ब्राह्मण, उपनिषद्, सूत्र आदि के काल में देवता-तत्त्व
का विकास हुआ है' वैदिक सिद्धान्त के सर्वथा विरुद्ध है । अतएव मन्त्रभाग में भी ब्राह्मण, पुराण, सूत्र आदि
का उल्लेख मिलता है । अतः मन्त्र, ब्राह्मण, पुराण आदि सब के समन्वय द्वारा निर्धारित अर्थ ही वास्तविक
वेदार्थ है ।