रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंख्या १ रामोपासना ९३७
“अनामिके कनिष्ठाभ्यां तर्जनीभ्यां च मध्यमे । अन्योन्याभिमुखाश्लिष्टा ॥”
दोनों अनामिकाओं को दोनों कनिष्ठिकाओं से दोनों तर्जनियों को दोनों मध्यमाओं से अन्योन्य संश्लिष्ट
करना धेनुमुद्रा है ।
“कनिष्ठेऽन्योन्यसंलग्नेऽभिमुखेऽपि परस्परम् । वामस्य तर्जनीमध्ये मध्यनामिकयोरपि ॥
वामानामिकसंस्पृष्टा तर्जनीमध्यशोभिता । पर्यायेण नताऽङ्गुष्ठद्वयी कौस्तुभलक्षणा ॥”
दोनों कनिष्ठिकाएँ अन्योन्य अभिमुख ओर संलग्न होने पर भी परस्पर वामहस्त की तर्जनी और मध्यमा,
मध्यमा और अनामिका में वाम अनामिका से तर्जनी और मध्यमा पर्याय से शोभित हों और दोनों अङ्गुष्ठ नत रहें
यही कौस्तुभमुद्रा है ।
“हस्तौ तु सम्मुखौ कृत्वा संहृतप्रोन्नताङ्गुली ।
तलान्तमिलिताङ्गुष्ठौ कृत्वैषा पद्ममुद्रिका ॥”
“कनिष्ठान्योन्यसंलग्ना विपरीतं तु योजिता ।
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