रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ रामायणमीमांसा द्वितीय
इस मन्त्र में पिछले मन्त्र से कुछ पाठभेद भी है। स्वरभेद तो है ही। इन्द्र सीता को ग्रहण करें। पूषा उसकी
रक्षा करें। वह पयस्वती सीता, उत्तरोत्तर वर्षों में, हमें धन-धान्य प्रदान करती रहें।
पारस्करगृह्यसूत्र आदि के अनुसार सीता-यज्ञों में भी केवल जड़ लाङ्गल-रेखारूप सीता का ही नहीं किन्तु
कृषि की अधिष्ठात्री लक्ष्मीरूपा सीता का ही यजन किया जाता है; इसी लिए उसमें इन्द्र-पत्नी सीता का आह्वान
किया गया है—
"यस्या भावे वैदिकलौकिकानां भूतिर्भवति कर्मणामिन्द्रपत्नी-
मुपह्वये सीतां सा मे त्वनपायिनी भूयात् कर्मणि कर्मणि स्वाहा॥"
जिसके भाव (अस्तित्व) में वैदिक और लौकिक दोनों कर्मों की सत्ता निहित है वह सीता सब कर्मों में
अनपायिनी होकर सन्निहित रहे। इन्द्रपत्नी सीता का हम ध्यान करते हैं।
यहाँ स्पष्टरूप से इन्द्र-पत्नी श्रीराम की पट्टमहिषी सीता का ही वर्णन है। इन्द्र ईश्वर का नाम है। यह
पीछे सप्रमाण बतलाया जा चुका है।
“वीरणादिमयी सीता कुमारी देवता विरच्यते”—सूत्र के देवपालीय भाष्य के अनुसार सीता-यज्ञ में उसी
की वीरणादिमयी कुमारी देवता मूर्ति बनायी जाती है जैसे विष्णु, शिव, लक्ष्मी, गौरी आदि की मूर्ति बनायी जाती
है वैसे ही सीता की भी मूर्ति समझनी चाहिये। मानवगृह्यसूत्र में भी इस की पूजा का विधान है।
अथर्ववेद के कौशिकसूत्र के अनुसार अनेक विलक्षण घटनाओं के होने पर अपशकुनों के निवारणार्थ एक
विशिष्ट कर्म किया जाता था, उसमें सीता की जो विस्तृत स्तुति मिलती है वह भी किसी जड़ की स्तुति नहीं है
किन्तु महालक्ष्मीरूपा सीताजी की ही है।
“वित्तिरसि पुष्टिरसि प्राजापत्यानां त्वाहं मयि
पुष्टिकामो जुहोमि स्वाहा।
कुमुद्वती पुष्करिणी सीता सर्वाङ्गशोभिनी।
कृषः सहस्रप्रकारा प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि ।।
उर्वी त्वाहर्मनुष्याः श्रियं त्वा मनवो विदुः।
आशयेऽन्नस्य नो धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः ।।
पर्जन्यपत्नि हिरण्यभिजातास्यभि नो वेद।
कालनेत्रे हविषा नो जुषस्व तृप्तिं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ।।
याभिर्देवा असुरानकल्पयन् यानूतन् गन्धर्वान् राक्षसांश्च ।
ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रपोषं सुभगे रराणा ।।
हिरण्यस्रक् पुष्करिणी श्यामा सर्वाङ्गशोभिनी।
कृषिर्हिरण्यप्रकारा प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि ।।
अश्विभ्यां देवि सह संविदाना इन्द्रेण राधेन
सह पुष्ट्या न आगहि ।।
विशस्त्वा रासन्तां प्रदिशोऽनु सर्वाहोरात्रार्धमासमास
आर्तवा ऋतुभिः सह ।।
भर्त्री देवानामृत मर्त्यानां भर्त्री प्रजानामृत मनुष्याणाम् ।।