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रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

८२८ गङ्गा संहिता
स्तुत्यो नम्यश्चगम्यश्चिदचिदुभयव्यापिवर्म्मानिरूष्मा
रामः स्वापं म एयादसितमणितनुर्दोैलिकायां स चित्ते ॥
जो श्रीरामजी वीरो के अग्रसर हैं तथा जो देव, दानव, मनुष्य तथा अन्य प्राणियो के कर्ता
रक्षक तथा नाश करनेवाले भी है, सभी प्रशस्तियो से युक्त है हेयगुणो के स्पर्श से भी रहित
है । तथा जो परात्पर है, स्थूल एव सूक्ष्म चेतन तथा अचेतन को अपने शरीर मे समाये हुये है
तथा सर्वोत्कृष्ट विनय निरभिमानता आदि गुणो से सम्पन्न है ऐसे इसलिये केवल वे ही स्तुति
के प्रणाम के तथा ध्यान के योग्य है ऐसे नीलमणि के समान कान्ति से युक्त शरीरवाले श्री
रामजी मेरे मन रूपी पालने मे शयन करे मेरा मन सदा ही उनमे लगा रहे ॥८॥
ततो निवेदितनैवेद्यं मनसा चतुर्भागं परिकल्प्य हनुमदङ्गदसुग्रीवविभीषणेभ्यो-
निवेद्यानन्तरं पूर्वाचार्यादिभ्यः स्वाचार्येभ्यश्चनिवेद्य शेषं भागवतैः सहभुञ्जीत ।
अनन्तर श्रीरामजी को निवेदित नैवेद्य को मन से चारभागकी कल्पना करके 'हुं हनुमते नम'
इस मन्त्र से श्रीहनुमानजी को तथा 'अ अंगदाय नम' बोलकर श्रीअंगदजी को तथैव 'सुंसुग्रीवाय
नम' मन्त्र से श्रीसुग्रीव और 'वि विभीषणाय नम' बोलकर श्रीविभीषणजी को निवेदन करने के
बाद 'ॐ ब्रह्मादि समस्त पूर्वाचार्येभ्यो नम महा नैवेद्य समर्पयामि' ऐसा बोलकर समस्त पूर्वाचार्यो
को राजभोग का समर्पण करने के बाद 'ॐ स्वाचार्येभ्यो महाप्रसादं समर्पयामि' ऐसा बोलकर
स्वाचार्यजी को महाप्रसाद समर्पण करने के बाद शान्तचित्त से भागवत तथा समागत अभ्यागतों
के साथ महाप्रसाद का सेवन करे । श्रीवैष्णवो को यह खास ख्याल रखना चाहिये कि जब कभी
जो कोई भोज्य पदार्थ परेश श्रीरामजी को भोग लगाया जाय परोक्त विधि से सभी को समर्पण
करके ही स्वय सेवन करे एकाकी नही ।
रामानन्दोपदिष्टेयं श्रीरामार्चनपद्धतिः । मुमुक्षूणां मुदेश्चयाच्छ्रीरामप्रीतिकारिणी ॥१॥
अर्चकोयःसमभ्यर्च्यदास्यायेमामहर्दिवम् । प्रसाद्य सगणं रामं लभते गतिमुत्तमाम् ॥२॥
इत्यानन्दभाष्यकार जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यप्रणीत श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर परिशिष्ट
Ψ श्रीरामार्चनपद्धतिः Ψ
卐 श्रीरामः शरणं मम 卐
"मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरुषाणि भवन्त्यायुष्मत्पुरुषाणि
चाध्येतारश्चमङ्गलयुक्ता स्यु" इस स्मृति वचनानुसार आचार्य सम्राट् जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यजी
प्रबन्धप्रकरणान्त मे आशीर्वादात्मक मंगल वचन पूर्वक प्रकरणोपसहार करते है—
ज गु श्रीरामानन्दाचार्यजी से स्वशिष्य ज गु श्रीसुरसुरानन्दाचार्यजी के "तत्त्वं किम् ? आदि
दश प्रश्नों को निमित्त बनाकर सर्वलोकोपकारार्थ उपदिष्ट यह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के श्रीचरणों
मे अनन्य प्रीति करानेवाली श्रीरामार्चनपद्धति सब मुमुक्षुजनोके लिये सायुज्य मुक्ति प्राप्त कराने
वाली हो ॥१॥
जो अर्चक श्रीरामजी की पूजा इस श्रीरामार्चनपद्धति के विधानानुसार सदा त्रिकाल अच्छी
तरह से समाराधन करेगा वह श्रीरामजी के सब गणो के साथ उन्हे प्रसन्नकर सर्वोत्तम सायुज्य
मुक्ति को प्राप्त करेगा ॥२॥