रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
सप्तविंशप्रकाशः २७. ( २६३ )
काहूको तुम दंड द्रव्य नहीं देते कृपाण जो करवाल है सो है करमें हाथमें
जिनके ॥ ५ ॥ यामें परिसंख्या है वर्ण जे अरुणादि हैं तिनको संकर मिलाइबो
द्विजराज (चन्द्रमा) मित्र (सूर्य) जाको राज सकल जगको मंडन (भूषण)
है ऐसे जे तुम हौ ते चिरु चिरु कहे बहु काल पर्यंत राज करौ ॥ ६ ॥
मू०-वायु । राजारामचंद्रतुमराजहुसुयशजाकोभूतलकेआ-
सपाससागरकोपाससो। सागरमेंबड़भागबेषशेषनागजूकोजैपै
सुखदानिसोईबिष्णुकोनिवाससो ॥ बिष्णुजूमेंभूरिभावभाव-
कोप्रभावजैसेसोभवजूकेभालमेंबिभूतिकोविलाससो । भूतिमा-
हचंद्रमासोचंद्रमेंसुधाकोअंशुअंशुनिमेंकेशोदासचंद्रिकाप्रका-
शसो ॥७॥ देवगण। राजारामचंद्रतुमराजकरोसबकालदीरघ-
दुसहदुखदीननकोदारिये । केशोदासमित्रदोषमंत्रदोषब्रह्मदोष
देवदोषराजदोषदेशतेनिवारिये ॥कलहकृतघ्नमहिमंडलकेवरि-
बंडपाखंडअखंड खंडखंडकरिडारिये। वंचककठोरठेलिकीजै-
बाटआटझूठपाठकंठ पाठकारीकाठमाहिंमारिये॥८॥ऋषिगण।
भोगभारभागभारकेशवविभूतिभारभूमिभारभूरिअभिषेकनके
जलसे।दानभारगानभार सकलसयानभारघनभारधर्मभारअ-
क्षतअमलसे॥ जयभारयशभारराजभारराजतैहरामशिरआशि-
षअशेषमंत्रबलसे । देशदेश यत्रतत्रदेखिदेखितेहिदुखफाटतहैं
दुष्टनकेशीशदाह्योफलसे ॥ ९ ॥
टी०-पास कहे फांस अंशु (किरणि) ॥ ७ ॥ दारिये कहे नाश करत हौ
वंचक (ठग) कठोर (निर्दय) झूठरूपी जो पाठहै ताके जे कंठपाठकारी हैं अर्थ
जे गूढ़ही कहौ करत हैं विभूति (ऐश्वर्य) ॥ ८ ॥ ९ ॥
मू०-केशव-विजयाछंद ॥ जाइनहींकरतूतिकहीसबश्री
सविताकविताकरिहारो । याहीतेकेशवदासअशीषपढ़ैअपनो
करिनेकुनिहारो।कीरतिदेवनिकीदुलहीयशदूलहश्रीरघुनाथति-
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