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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 534 में से

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पृष्ठ 8

३
३—शाही फ़रमान और अन्य राजकीय पत्र आदि
४—प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ एवं संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, हिन्दी
और उर्दू की प्रकाशित पुस्तकें
प्राचीन शिलालेख इस राज्य से केवल तीन मिले हैं, जिनमें से दो
घोटार्सों गांव के विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ के आस-पास के
और तीसरा गौतमेश्वर का विक्रम की सोलहवीं शताब्दी का है। वि० सं०
की सत्रहवीं शताब्दी से बाद के शिलालेख और ताम्रपत्र प्रचुर मात्रा में
मिले हैं, जिनमें ताम्रपत्रों की ही अधिकता है।
बड़वे भाटों की बनाई हुई ख्यातें इस राज्य की कई हैं, जिनमें
राजाओं की वंशावली के अतिरिक्त उनकी रानियों, कुंवरों आदि के नाम
और उनका संक्षिप्त वृत्तान्त भी मिलता है। कहीं-कहीं राजाओं की गद्दी-
नशीनी का वर्ष, मास आदि भी दिया है, पर उनमें दिये हुए रानियों आदि
के नाम परस्पर एक-दूसरे से नहीं मिलते तथा संवत् एवं घटनाएं भी
बहुधा इतिहास की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। ऐसी दशा में उनका
वास्तविक महत्व सन्दिग्ध ही है।
इस राज्य के नरेशों में सर्वप्रथम महारावत हरिसिंह ने शाही
दरबार से संबंध जोड़ा था। हरिसिंह से लगाकर पृथ्वीसिंह तक के कई
शाही फ़रमान, शाहज़ादों के निशान आदि प्रतापगढ़ राज्य में विद्यमान हैं।
इनके अतिरिक्त शाही अख़बारात में भी यहां के नरेशों का वृत्तांत मिलता
है। मरहटा-काल के कुछ काग़ज़-पत्रों और अंग्रेज़ सरकार के साथ के पत्र-
व्यवहारों से भी इस राज्य की तत्कालीन स्थिति और इतिहास पर कुछ
प्रकाश पड़ता है।
"हरिभूषण महाकाव्य" (संस्कृत) के अतिरिक्त इस राज्य के
इतिहास से संबंध रखनेवाली और कोई प्राचीन पुस्तक नहीं मिली है।
अपूर्ण होने पर भी उक्त महाकाव्य से हरिसिंह से पूर्व के नरेशों के इति-
हास पर थोड़ा प्रकाश पड़ता है। उसमें दी हुई घटनाओं का मिलान भी
अन्य ग्रन्थों से हो जाता है, परन्तु काव्य-ग्रंथ होने से कई स्थलों पर