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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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३६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
के स्वामी गुहिलवंशी खुम्माण (तृतीय) के पुत्र भर्तृपट्ट (भर्तृभट, द्वितीय)
ने भी वि० सं० ९९९ श्रावण सुदि १ (ई० सं० ९४२ ता० १७ जुलाई)
को पलासकूपिका (पलासिया, मंदसोर से १५ मील दक्षिण में) गांव और
वंच्वूलिका नाम का कच्छ (काछा = तर भूमि) भेंट किया था¹। इसी प्रकार
चामुंडराज के पुत्र देवराज ने 'इंद्रराजादित्यदेव' के मंदिर को 'कोसवाह'
(चड़स से पिलाये जानेवाला) 'छित्तुलाक' नामक क्षेत्र, जिसमें दस माणी
अन्न बोया जाता था, भेंट किया था²।
(१३) देवपाल (संख्या ६ का पुत्र)।
(१४) विजयपाल (संख्या १३ का भाई)।
(१५) राज्यपाल (संख्या १४ का भाई)—उसके समय में इन रघुवंशी
प्रतिहारों का राज्य अत्यंत निर्बल हो गया। ऐसे समय में हि० स० ४०६
ता० ८ शावान (वि० सं० १०७५ मार्गशीर्ष सुदि १० = ई० स० १०१८ ता०
२१ नवम्बर) को सुलतान महमूद ग़ज़नवी ने कन्नौज पर चढ़ाई कर दी,
जिसमें उस(राज्यपाल)की हार हुई और वह भाग गया। फिर उसने
सुलतान की अधीनता स्वीकार कर संधि कर ली। सुलतान के भारत से
लौट जाने के पीछे वि० सं० १०७८ (ई० स० १०२१) में उस(राज्यपाल)-
पर कालिंजर के राजा गंड की चढ़ाई हुई, जिसमें वह (राज्यपाल) मारा गया।
(१६) त्रिलोचनपाल (संख्या १५ का उत्तराधिकारी)।
(१७) यशपाल (?)-उसके समय का वि० सं० १०६३ (ई० स०
१०३६) का शिलालेख मिला है। राज्यपाल के समय से ही कन्नौज के
(१) देखो ऊपर पृ० २२ टिप्पण संख्या १।
(२) ॰॰॰॰॰॰श्रीदेवराजेन श्रीचामुण्डराजसुतः(सुतेन) श्रीमदिन्द्रा-
दित्यदेवस्य कोसवाहे छित्तुल्लाकक्षेत्रं माणीवाप १० शासनेन प्रदत्तं।
श्रीमदिन्द्रादित्यदेवजगत्यां। त्रैलोक्यमोहनदेवस्य श्रीमदिन्द्राजेन उंडि
त्राकक्षेत्रं [अस्य] आघाटा लिख्यंते ॰॰॰॰॰॰॰॰एवं चतुराघाटोपलक्षितं
शासनेन प्रदत्तं।
एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८७-१८८।