राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३१
चावड़े¹, परमार², रघुवंशी³ आदि प्रतिहारों के उदाहरण मिलते हैं। विक्रम की
आठवीं शताब्दी से रघुवंशी-प्रतिहारों का उत्कर्ष होने लगा और वे बड़े पराक्रम-
(१) द्योणिकल्पतरुः समीकसुभ(ग)श्चापोत्कटग्रामणीः
योगीन्द्रो नवचंद्रनिर्मलगुणः स्फूर्जत्कलानैपुणः ॥
श्रीचौलुक्यनरेन्द्रवेत्रितिलकः श्रीसोमराजः स्वयं
विद्वन्मण्डलमंडनाय तनुते संगीतरत्नावलीम् ॥ ५ ॥
संगीत रत्नावली; ना० प्र० प०, जि० ६, पृ० ३१६ ।
(२) श्रीमदुत्पलराजादिवंशे प्रामारभूभुजां ।
अस्ति त्रैलोक्यविख्यातो धारावर्षो महीपतिः ॥ २ ॥
द्वास्थः तस्याभवत् पूर्वं वीरो वारडवंशजः ।
नरपा[लस]मुद्भूतो हरिपाल इति श्रुतः ॥ ३ ॥
पुत्रस्तस्यास्ति विख्यातो भुवने लब्धविक्रमः ।
श्रीमत्साहणपालाह्वः वैरिवर्गक्षयंकरः ॥ ४ ॥......
संवत् १२६४ वर्षे चैत्र शुदि १३ गुरौ । म० जालाकप्रेरितेन
स्वश्रेयोर्थं प्रती० साहणपालेन देवश्रीवैद्यनाथस्य मंडपः कारितः ॥...।
ईडर राज्य के वढाली गांव के वैद्यनाथ शिवालय की प्रशस्ति ।
पुरातत्व (गुजराती, अहमदाबाद); जि० ४, पृ० २८१ ।
'वारड' परमारों की एक शाखा का नाम है और दांता के राणा 'वारड' शाखा
के परमार हैं ।
(३) मन्विद्वाकुकुकुस्थ(त्स्थ)मूलपृथवः दमापालकल्पद्रुमाः ॥ २ ॥
तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वज्रेषु घोरं
रामः पौलस्त्यहिन्श्रं (हिंस्रं) क्षतविहितसमित्कर्म्म चक्रे पलाशैः ।
श्लाघ्यस्तस्यानुजोसौ मघवमदमुषो मेघनादस्य संख्ये
सौमित्रिस्तीव्रदण्डः प्रतिहरणविधेर्य्यः प्रतीहार आसीत् ॥३॥
कन्नौज के प्रतिहार राजा भोजदेव के समय की ग्वालियर की प्रशस्ति । ऐन्युअल
रिपोर्ट ऑव् दि आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑव् इण्डिया, ई० स० १६०३-४; पृ० २८० ।
नागरी प्रचारिणी पत्रिका (नवीन संस्करण); भाग ६, पृ० ३१७ । मेरा राजपूताने का
इतिहास; जिल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ७४ ।